पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! तू (हरिभिः) = इन्द्रियाश्वों के द्वारा (कण्वस्य) = बुद्धिमान् पुरुष की (सुष्टुतिम्) = उत्तम स्तुति को (उप आयाहि) = समीपता से प्राप्त हो । अर्थात् जैसे एक बुद्धिमान् पुरुष प्रभु का स्तवन करता है, तू भी उसी तरह प्रभु का स्तवन करनेवाला बन। [२] और (अमुष्य) = उस (दिवः) = प्रकाशमय [ज्ञान के पुञ्ज] (शासतः) = शासक प्रभु के (दिवम्) = ज्ञान-प्रकाश को (यय) = प्राप्त हो। हे (इन्द्र) = दिवावसो ! तू ज्ञानरूप धनवाला तो है ही। ज्ञान ही तो तेरा वास्तविक धन है। सो हे दिवावसो ! तू प्रभु का स्तवन कर और उस प्रकाशमय प्रभु के प्रकाशरूप धन को प्राप्त कर ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु जीव को प्रेरणा देते हैं कि- तू मेधावी पुरुष की तरह प्रभु का स्तवन करनेवाला बन, [ख] तथा दिवावसु बनता हुआ प्रभु से प्रकाशरूप धन को प्राप्त करनेवाला हो ।