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स॒त्यमि॒त्था वृषेद॑सि॒ वृष॑जूति॒र्नोऽवृ॑तः । वृषा॒ ह्यु॑ग्र शृण्वि॒षे प॑रा॒वति॒ वृषो॑ अर्वा॒वति॑ श्रु॒तः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

satyam itthā vṛṣed asi vṛṣajūtir no vṛtaḥ | vṛṣā hy ugra śṛṇviṣe parāvati vṛṣo arvāvati śrutaḥ ||

पद पाठ

स॒त्यम् । इ॒त्था । वृषा॑ । इत् । अ॒सि॒ । वृष॑ऽजूतिः । नः॒ । अवृ॑तः । वृषा॑ । हि । उ॒ग्र॒ । शृ॒ण्वि॒षे । प॒रा॒ऽवति॑ । वृषः॑ । अ॒र्वा॒ऽवति॑ । श्रु॒तः ॥ ८.३३.१०

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:33» मन्त्र:10 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:8» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:10


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वृषा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सत्यम्) = सचमुच (इत्था) = इस प्रकार आप (वृषा इत् असि) = सब सुखों का वर्षण करनेवाले हैं। (नः) = हमारे लिये (वृषजूतिः) = सुखकर प्रेरणा को देनेवाले हैं। (अवृतः) = आप कभी भी शत्रुओं से घेरे नहीं जाते। [२] हे (उग्र) = तेजस्विन् प्रभो ! आप (हि) = निश्चय से (वृषा) = सब सुखों का वर्षण करनेवाले (शृण्विषे) = सुने जाते हैं। (परावति) = सुदूर देश में भी आप वृषा सुखवर्षक हैं। (उ) = और (अर्वावति) = समीप देश में भी [वृषा] (श्रुतः) = सुखवर्षक रूप में प्रसिद्ध हैं। क्या दूर, क्या समीप, आप सर्वत्र कल्याण करनेवाले हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु वृषा हैं, सुखवर्षक हैं। सुखकर प्रेरणाओं को देते हुए और हमारे शत्रुओं को समाप्त करते हुए, वे दूर व समीप सर्वत्र ही सुख प्राप्त करानेवाले हैं।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - True it is thus you are virile and generous yourself and an inspiration and driving force for the virile and the brave, unbound, uncountered, brave and illustrious, harbinger of the showers of peace and joy and known as omnificent and sublime all over the world far and near.