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व॒यं घ॑ त्वा सु॒ताव॑न्त॒ आपो॒ न वृ॒क्तब॑र्हिषः । प॒वित्र॑स्य प्र॒स्रव॑णेषु वृत्रह॒न्परि॑ स्तो॒तार॑ आसते ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vayaṁ gha tvā sutāvanta āpo na vṛktabarhiṣaḥ | pavitrasya prasravaṇeṣu vṛtrahan pari stotāra āsate ||

पद पाठ

व॒यम् । घ॒ । त्वा॒ । सु॒तऽव॑न्तः । आपः॑ । न । वृ॒क्तऽब॑र्हिषः । प॒वित्र॑स्य । प्र॒ऽस्रव॑णेषु । वृ॒त्र॒ऽह॒न् । परि॑ । स्तो॒तारः॑ । आ॒स॒ते॒ ॥ ८.३३.१

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:33» मन्त्र:1 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:7» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:1


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उपासक का जीवन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (वृत्रहन्) = वासना को विनष्ट करनेवाले प्रभो ! (वयम्) = हम (घ) = निश्चय से (त्वा) = आपको (स्तोतारः) = [स्तवन करनेवाले बनकर उपासित करते हैं। [२] (सुतावन्तः) = सोम का सम्पादन करनेवाले, (आपः न) = जलों के समान, अर्थात् शान्त व नम्रता से गति करनेवाले, (वृक्तबर्हिषः) = जिन्होंने हृदयक्षेत्र से वासनाओं को दूर किया है [वृजी वर्जने], ऐसे ये स्तोता लोग (पवित्रस्य) = जीवन को पवित्र बनानेवाले सोम के (प्रस्त्रवणेषु) = शरीर में चारों ओर प्रस्तुत होने पर शरीर में ही व्याप्त होने पर, हे प्रभो ! परि आसते आपका उपासन करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु का उपासक [क] शरीर में सोम का रक्षण करता है, [ख] जलों की तरह शान्त व नम्र स्वभाववाले होते हैं, [ग] शरीर में सोम को व्याप्त करते हुए हृदय को पवित्र बनाते हैं।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, destroyer of evil, darkness and suffering, we, your celebrants, having distilled the soma, spread and occupied the holy grass, we, sit and wait on the vedi for your presence in the flux of life as holy performers, while the flow of pure immortality continues all round in the dynamics of existence.