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उ॒त न॑: पि॒तुमा भ॑र संररा॒णो अवि॑क्षितम् । मघ॑व॒न्भूरि॑ ते॒ वसु॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uta naḥ pitum ā bhara saṁrarāṇo avikṣitam | maghavan bhūri te vasu ||

पद पाठ

उ॒त । नः॒ । पि॒तुम् । आ । भ॒र॒ । स॒म्ऽर॒रा॒णः । अवि॑ऽक्षितम् । मघ॑ऽवन् । भूरि॑ । ते॒ । वसु॑ ॥ ८.३२.८

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:32» मन्त्र:8 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:2» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:8


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अविनाशक अन्न व धन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (उत) = और हे प्रभो ! (संरारण:) = हमारे से की जानेवाली स्तुति में रमण करते हुए आप (नः) = हमारे लिये (अविक्षितम्) = जिससे विनाश नहीं होता उस (पितुम्) = अन्न का (आभर) = भरण करिये, हमें ' अविक्षित अन्न' को प्राप्त कराइये। [२] हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् प्रभो ! (ते वसु) = आप से दिया जानेवाला धन (भूरि) = हमारा खूब ही पालन व पोषण करनेवाला है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु हमारे लिये अविनाशक [पोषक] अन्न को तथा धन को देनेवाले हैं।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And, O lord of the power, honour and glory of the world, all joyous and generous, bring us the food of life inexhaustible. Infinite is your wealth and boundless your munificence.