यदि॑ मे रा॒रण॑: सु॒त उ॒क्थे वा॒ दध॑से॒ चन॑: । आ॒रादुप॑ स्व॒धा ग॑हि ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
yadi me rāraṇaḥ suta ukthe vā dadhase canaḥ | ārād upa svadhā gahi ||
पद पाठ
यदि॑ । मे॒ । र॒रणः॑ । सु॒ते । उ॒क्थे । वा॒ । दध॑से । चनः॑ । आ॒रात् । उप॑ । स्व॒धा । आ । ग॒हि॒ ॥ ८.३२.६
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:32» मन्त्र:6
| अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:2» मन्त्र:1
| मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:6
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सोमरक्षण- प्रभु-स्तवन- सात्विक अन्न सेवन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु जीव से कहते हैं कि (यदि) = यदि (मे) = मेरे (सुते) = उत्पन्न किये हुए इस सोम में (रारण:) = तू रमण करता है, (वा) = और यदि (उक्थे) = स्तोत्र में, स्तुति में रमण करता है तथा (चनः दधसे) = सात्त्विक अन्न का सेवन करता है। तो (स्वधा) = आत्मधारण शक्ति के हेतु से (आरात् उपगाहि) = हमारे अत्यन्त समीप प्राप्त होनेवाला हो [आरात् समीप] । [२] आत्मधारणशक्ति को प्राप्त करने के लिये प्रभु का सान्निध्य आवश्यक है। प्रभु के सान्निध्य के लिये तीन बातें सहायक होती हैं- [क] सोम का रक्षण, [ख] प्रभु का स्तवन [ग] सात्त्विक अन्न का सेवन।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम 'सोमरक्षण, प्रभु-स्तवन व सात्त्विक अन्न के सेवन' को अपनाकर प्रभु के उपासक बनें। यही आत्मधारणशक्ति की प्राप्ति का उपाय है।
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - If you take delight in the soma distilled by me and feel the ecstasy of my song of homage, then come from far and come from near and, by your own divine nature, take me on for the food of life you hold for me.
