स गोरश्व॑स्य॒ वि व्र॒जं म॑न्दा॒नः सो॒म्येभ्य॑: । पुरं॒ न शू॑र दर्षसि ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
sa gor aśvasya vi vrajam mandānaḥ somyebhyaḥ | puraṁ na śūra darṣasi ||
पद पाठ
सः । गोः । अश्व॑स्य । वि । व्र॒जम् । म॒न्दा॒नः । सो॒म्येभ्यः॑ । पुर॑म् । न । शू॒र॒ । द॒र्ष॒सि॒ ॥ ८.३२.५
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:32» मन्त्र:5
| अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:1» मन्त्र:5
| मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:5
0 बार पढ़ा गया
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
व्रज-विदारण
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो ! (मन्दानः) = स्तुति किये जाते हुए (सः) = वे आप (सोम्येभ्यः) = सोम का [वीर्य शक्ति का] रक्षण करनेवाले पुरुषों के लिये (गोः) = ज्ञानेन्द्रियों के तथा (अश्वस्य) = कर्मेन्द्रियों के (व्रजम्) = बाड़े को (विदर्षसि) = विदीर्ण करते हैं। इन इन्द्रियों को विषयों के बाड़े से बाहर करते हैं। प्रभु की उपासना उपासक की इन्द्रियों को विषयों में फँसने से बचाती है, और परिणामतः ये उपासक सोम का रक्षण कर पाते हैं। [२] हे (शूर) = शत्रुओं को शीर्ण करनेवाले प्रभो! आप इस विषयों की बाड़ को इस प्रकार विदीर्ण करते हैं, (न) = जैसे (पुरम्) = काम-क्रोध-लोभरूप शत्रुओं की नगरी को आप विनष्ट करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु ही उपासक की इन्द्रियों को विषयों की बाड़ से बाहर करते हैं और काम आदि शत्रुओं की नगरी का विध्वंस करते हैं।
0 बार पढ़ा गया
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Indra of such fame and prowess, heroic leader, happy and joyous, you open the gates of knowledge and victory in action and attainment, as you open the stalls of cows and horses and the gates of a fortress for the performers of soma yajna.
