प्रति॑ श्रु॒ताय॑ वो धृ॒षत्तूर्णा॑शं॒ न गि॒रेरधि॑ । हु॒वे सु॑शि॒प्रमू॒तये॑ ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
prati śrutāya vo dhṛṣat tūrṇāśaṁ na girer adhi | huve suśipram ūtaye ||
पद पाठ
प्रति॑ । श्रु॒ताय॑ । वः॒ । धृ॒षत् । तूर्णा॑शम् । न । गि॒रेः । अधि॑ । हु॒वे । सु॒ऽशि॒प्रम् । ऊ॒तये॑ ॥ ८.३२.४
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:32» मन्त्र:4
| अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:1» मन्त्र:4
| मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:4
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
श्रुताय ऊतये
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वः) = तुम्हारे (श्रुताय) = ज्ञान के लिये वे प्रभु वासना को (प्रतिधृषत्) = कुचल डालते हैं। वासना ही तो ज्ञान पर परदा डाले रखती है। वासना-विनाश से ज्ञान चमक उठता है। [२] मैं (ऊतये) = रक्षण के लिये (सुशिप्रम्) = शोभन हनु व नासिका को देनेवाले उस प्रभु को (हुवे) = इस प्रकार पुकारता हूँ, (न) = जैसे (गिरेः अधि) = मेघ या पर्वत से (तूर्णाशम्) = उदक को माँगते हैं। मेघ प्यासे के लिये उदक को प्राप्त कराके उसका रक्षण करता है, इसी प्रकार प्रभु हमें उत्तम जबड़े व नासिका प्राप्त कराके हमारा रक्षण करते हैं। जबड़ों से भोजन का ठीक चर्वण होने पर रोगों की आशंका जाती रहती है, और नासिका से गहरा श्वास लेने पर [ प्राणायाम करने पर] मानस दोषों का निराकरण हो जाता है। ,
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु वासना को विनष्ट करके हमारे ज्ञान का वर्धन करते हैं। उत्तम जबड़ों व नासिका छिद्रों को प्राप्त कराके प्रभु हमारा रक्षण करते हैं।
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - O people, for your protection and promotion, I invoke and call upon the victorious Indra of the glorious helmet who brings a flood of waters from the heights of the cloud in response to prayer and promise.
