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न्यर्बु॑दस्य वि॒ष्टपं॑ व॒र्ष्माणं॑ बृह॒तस्ति॑र । कृ॒षे तदि॑न्द्र॒ पौंस्य॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ny arbudasya viṣṭapaṁ varṣmāṇam bṛhatas tira | kṛṣe tad indra pauṁsyam ||

पद पाठ

नि । अर्बु॑दस्य । वि॒ष्टप॑म् । व॒र्ष्माण॑म् । बृ॒ह॒तः । ति॒र॒ । कृ॒षे । तत् । इ॒न्द्र॒ । पौंस्य॑म् ॥ ८.३२.३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:32» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:1» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:3


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अर्बुद - वेधन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (बृहतः) = महान् (अर्बुदस्य) = [अहे :] आहन्ता कामदेव के (विष्टपम्) = अत्यन्त संतापक (वर्माणम्) = इस सुन्दर रूप को [शरीर को] (नितिर) = विद्ध करिये। यह काम हमारे पर आक्रमण करता है। हमारे लिये इसके जीतने का सम्भव नहीं होता। इस काम का वेधन तो आपने ही करना है। यह काम सुन्दर है, पर परिणाम में अत्यन्त सन्तापक है। [२] हे (इन्द्र) = शत्रु संहारक प्रभो ! (तत् पौंस्यम्) = उस शक्ति के कर्म को (वृषे) = आप ही करते हैं। आपके लिये ही इसके संहार का सम्भव है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - इस अत्यन्त शक्तिशाली सन्तापक काम के शरीर को हे प्रभो! आप ही विद्ध कर पाते हैं। हमारे लिये इसके जीतने का सम्भव नहीं ।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, cosmic power of nature, you break the stronghold of the cloud of showers from the tip of vast heaven and thus accomplish that wondrous feat of divine power.