प्र व॑ उ॒ग्राय॑ नि॒ष्टुरेऽषा॑ळ्हाय प्रस॒क्षिणे॑ । दे॒वत्तं॒ ब्रह्म॑ गायत ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
pra va ugrāya niṣṭure ṣāḻhāya prasakṣiṇe | devattam brahma gāyata ||
पद पाठ
प्र । वः॒ । उ॒ग्राय॑ । निः॒ऽतुरे॑ । अषा॑ळ्हाय । प्र॒ऽस॒क्षिणे॑ । दे॒वत्त॑म् । ब्रह्म॑ । गा॒य॒त॒ ॥ ८.३२.२७
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:32» मन्त्र:27
| अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:6» मन्त्र:2
| मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:27
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'उग्र निष्टुर्' प्रभु का गुणगान
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (उग्राय) = उस तेजस्वी, (निष्टुरे) = शत्रुओं को नष्ट करनेवाले, (अषाढाय) = शत्रुओं से अभिभूत न होनेवाले, (प्रसक्षिणे) = शत्रुओं को अभिभूत करनेवाले प्रभु के लिये (वः) = तुम (देवत्तम्) = उस देव से ही दिये गये अथवा गुरु-शिष्य परम्परा के क्रम में ज्ञानियों से प्राप्त कराये गये (ब्रह्म) = स्तोत्र का (प्रगायत) = प्रकर्षेण गायन करो। [२] यह प्रभु के स्तोत्रों का गायन ही तुम्हें शत्रुओं से अभिभूत होने से बचायेगा। स्तोता के शत्रुओं को प्रभु ही पराजित करते हैं । प्रभु की शक्ति से सम्पन्न होकर यह स्तोता आन्तर व बाह्य शत्रुओं का पराजय करनेवाला होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु का गुणगान करें। यह गायन हमें उत्कृष्ट प्रेरणा प्राप्त करायेगा और काम आदि शत्रुओं के वशीभूत न होने देगा।
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - O celebrants and yajakas, sing the most heavenly song of praise worthy of divinity in honour of refulgent, impetuous, invincible and ever enduring friend, Indra, leader and commander of the ruling and defensive forces of nature and humanity.
