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अह॑न्वृ॒त्रमृची॑षम और्णवा॒भम॑ही॒शुव॑म् । हि॒मेना॑विध्य॒दर्बु॑दम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ahan vṛtram ṛcīṣama aurṇavābham ahīśuvam | himenāvidhyad arbudam ||

पद पाठ

अह॑न् । वृ॒त्रम् । ऋची॑षमः । औ॒र्ण॒ऽवा॒भम् । अ॒ही॒शुव॑म् । हि॒मेन॑ । अ॒वि॒ध्य॒त् । अर्बु॑दम् ॥ ८.३२.२६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:32» मन्त्र:26 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:6» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:26


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

और्णवाभम

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ऋचीषमः) = स्तुति के समान वह प्रभु [प्रभु की जितनी भी स्तुति करें, प्रभु उतने ही महान् हैं। प्रभु की कभी अधिक स्तुति तो हो ही नहीं सकती। वे अनन्त हैं, स्तुति तो सान्त ही रहेगी] (वृत्रम्) = ज्ञान की आवरणभूत वासना को (अहन्) = नष्ट करते हैं। [२] (और्णवाभम्) = मकड़ी के समान छल-छिद्र के जाल के तनने की वृत्ति को वे प्रभु नष्ट करते हैं। इसी प्रकार (अहीशुवम्) = [श्विगतौ] सर्प की तरह कुटिल गतिवाली आसुरी वृत्ति को प्रभु नष्ट करते हैं। [२] (अर्बुदम्) = साँप को हिमेन कपूर के द्वारा [campher] अथवा [fresh butter] मक्खन के द्वारा (अविध्यत्) = बींधते हैं। प्रभु का उपासक 'अर्बुद' का 'हिम' से ही वेधन करेगा।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु का स्तवन करें। यह स्तवन हमें वासना, छलछिद्र के जालों, कपट से वृद्धि व सर्पवृत्ति से सदा दूर रखेगा।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The refulgent sun breaks the heavy cloud of vapours moving around like a crooked snake, in the middle regions of space.