अध्व॑र्य॒वा तु हि षि॒ञ्च सोमं॑ वी॒राय॑ शि॒प्रिणे॑ । भरा॑ सु॒तस्य॑ पी॒तये॑ ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
adhvaryav ā tu hi ṣiñca somaṁ vīrāya śipriṇe | bharā sutasya pītaye ||
पद पाठ
अध्व॑र्यो॒ इति॑ । आ । तु । हि । सि॒ञ्च । सोम॑म् । वी॒राय॑ । शि॒प्रिणे॑ । भर॑ । सु॒तस्य॑ । पी॒तये॑ ॥ ८.३२.२४
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:32» मन्त्र:24
| अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:5» मन्त्र:4
| मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:24
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रभु स्मरण से सोमरक्षण, सोमरक्षण से प्रभु-दर्शन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अध्वर्यो) = यज्ञशील पुरुष ! तू (वीराय) = [वि + ईर] शत्रुओं को कम्पित करनेवाले, (शिप्रिणे) = उत्तम हनु व नासिका को प्राप्त करानेवाले प्रभु की प्राप्ति के लिये (तु हि) = शीघ्र ही (सोमम्) = सोम को, वीर्यशक्ति को (आसिञ्च) = शरीर में समन्तात् सींचनेवाला बन। इस शक्ति के रक्षण से ही दीप्त ज्ञानार्यग्निवाला बनकर तू सूक्ष्म बुद्धि से प्रभु का दर्शन करेगा। [२] तू (सुतस्य) = इस उत्पन्न सोम के (पीतये) = शरीर में ही पीने के लिये भी (भरा) = उस प्रभु को हृदय में धारण कर। यह प्रभु-स्मरण (वासना) = विनाश के द्वारा तुझे सोमरक्षण के योग्य बनायेगा ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु स्मरण से हम सोम का रक्षण कर पायेंगे। सुरक्षित सोम बुद्धि को तीव्र बनाकर हमें प्रभु-दर्शन के योग्य बनायेगा ।
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - O organiser and performer of yajna, offer the soma of devotion profusely to Indra, mighty lord of the helmet, and fill the vessel of your heart with divine love and pranic energy to enjoy life to the full.
