इ॒हि ति॒स्रः प॑रा॒वत॑ इ॒हि पञ्च॒ जनाँ॒ अति॑ । धेना॑ इन्द्राव॒चाक॑शत् ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
ihi tisraḥ parāvata ihi pañca janām̐ ati | dhenā indrāvacākaśat ||
पद पाठ
इ॒हि । ति॒स्रः । प॒रा॒वतः॑ । इ॒हि । पञ्च॑ । जना॑न् । अति॑ । धेनाः॑ । इ॒न्द्र॒ । अ॒व॒ऽचाक॑शत् ॥ ८.३२.२२
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:32» मन्त्र:22
| अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:5» मन्त्र:2
| मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:22
0 बार पढ़ा गया
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
इहि तिस्रः, इहि पञ्च
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! तू (परावतः) = दूर देश से इन्द्रियों के इधर-उधर भटकने को छोड़कर (तिस्त्रः) = ऋग्, यजु, सामरूप तीन प्रभु की वाणियों को (इहि) = प्राप्त हो। इन वाणियों को प्राप्त करके (पञ्च) = पाँचों जनान् विकासों को, पाँचों कोशों के उत्कर्ष को (अति इहि) = अतिशयेन प्राप्त कर । [२] हे इन्द्र ! तू (धेनाः) = इन ज्ञान की वाणियों को (अवचाकशत्) = देखता हुआ हो। सदा तू इन ज्ञान की वाणियों का अध्ययन करनेवाला बन।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम जितेन्द्रिय बनकर, इन्द्रियों के विषयों में न भटकने देकर ज्ञान की वाणियों का ध्ययन करें। पाँचों कोशों के विकास को ठीक प्रकार से कर पायें। सदा प्रभु की इन ज्ञान- वाणियों को देखनेवाले बनें।
0 बार पढ़ा गया
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Indra, come from far, cross over the five classes of people to exhaust the possibilities of their life, transcend the three versions of knowledge, action and prayer, and listen with love and approval the sole one voice of my soul.
