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अती॑हि मन्युषा॒विणं॑ सुषु॒वांस॑मु॒पार॑णे । इ॒मं रा॒तं सु॒तं पि॑ब ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

atīhi manyuṣāviṇaṁ suṣuvāṁsam upāraṇe | imaṁ rātaṁ sutam piba ||

पद पाठ

अति॑ । इ॒हि॒ । म॒न्यु॒ऽसा॒विन॑म् । सु॒सु॒ऽवांस॑म् । उ॒प॒ऽअर॑णे । इ॒मम् । रा॒तम् । सु॒तम् । पि॒ब॒ ॥ ८.३२.२१

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:32» मन्त्र:21 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:5» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:21


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सोमरक्षण व प्रभु प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (मन्युषाविणम्) = ज्ञान को उत्पन्न करनेवाले प्रभु को [मन्यु ज्ञान, षु = पैदा करना] (अति इहि) = अतिशयेन प्राप्त हो। (उपारणे) = [Proximity समीपता] समीपता के निमित्त (सुषुवांसम्) = इस सोम का सम्पादन करनेवाले प्रभु को [अति इहि: ] अतिशयेन प्राप्त हो। प्रभु ने हमारे शरीरों में सोम का सम्पादन किया है। इसके रक्षण के द्वारा हम प्रभु को प्राप्त करनेवाले बनते हैं। [२] इसलिए हे जीव ! (इमम्) = इस (रातम्) = दिये हुए (सुतम्) = सोम को (पिब) = तू पीनेवाला बन। इस सोम के पान से ही हम प्रभु के सान्निध्य को प्राप्त करेंगे। यह प्रभु सान्निध्य हमारे अन्दर उत्कृष्ट ज्ञान - ज्योति को जगायेगा।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु ने हमें यह सोमशक्ति प्राप्त कराई है। इसके पान से हम प्रभु की समीपतावाले होंगे। प्रभु की समीपता में उत्कृष्ट ज्ञान को प्राप्त करेंगे।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ignore the man who offers yajnic soma in a mood of anger, frustration and protest. Ignore the man who offers yajna and soma but in a joyless and conflictive mood. Accept this soma of homage distilled and offered in a state of delight, love and faith.