पिब॒ स्वधै॑नवानामु॒त यस्तुग्र्ये॒ सचा॑ । उ॒तायमि॑न्द्र॒ यस्तव॑ ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
piba svadhainavānām uta yas tugrye sacā | utāyam indra yas tava ||
पद पाठ
पिब॑ । स्वऽधै॑नवानाम् । उ॒त । यः । तुग्र्ये॑ । सचा॑ । उ॒त । अ॒यम् । इ॒न्द्र॒ । यः । तव॑ ॥ ८.३२.२०
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:32» मन्त्र:20
| अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:4» मन्त्र:5
| मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:20
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सोमरूप सम्पत्ति
पदार्थान्वयभाषाः - [१] 'वेदवाणी' ज्ञानदुग्ध को देनेवाली, प्रभु की धेनु है। विविध ज्ञान ही इस धेनु के (धैनव) = दुग्ध हैं। हे जीव ! तू (स्वधैनवानाम्) = उस परमात्मा [स्व] की वेद-धेनु के इन ज्ञानदुग्धों का (पिब) = पान कर। (उत्) = और (यः) = जो सोम (तुग्र्ये) = [ तुग्र्या = water आप:- रेतः] रेतःकणों के रक्षक पुरुष में [तुग्र्याः अस्य सन्ति इति] (सचा) = समवेत होता है, उस सोम का तू पान कर। [२] (उत) = और हे इन्द्रजितेन्द्रिय पुरुष (अयम्) = यह (यः) = जो सोम है, वह (तव) = तेरा है। यह सोम ही तेरी वास्तविक सम्पत्ति है। यही तेरी ज्ञानाग्नि को दीप्त करके तुझे ज्ञानदुग्धों के पान के योग्य बनायेगा ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम सोम का रक्षण करें। इस प्रकार ज्ञानदुग्धों का पान करनेवाले बनें। यह सोम ही हमारी वास्तविक सम्पत्ति है।
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Drink of the joy and exhilaration of your powers and perceptions which is all associated with your own performance, the super-power that’s you and yours. Indeed, it is all your own power and glory.
