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यः सृबि॑न्द॒मन॑र्शनिं॒ पिप्रुं॑ दा॒सम॑ही॒शुव॑म् । वधी॑दु॒ग्रो रि॒णन्न॒पः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yaḥ sṛbindam anarśanim pipruṁ dāsam ahīśuvam | vadhīd ugro riṇann apaḥ ||

पद पाठ

यः । सृबि॑न्दम् । अन॑र्शनिम् । पिप्रु॑म् । दा॒सम् । अ॒ही॒शुव॑म् । वधी॑त् । उ॒ग्रः । रि॒णन् । अ॒पः ॥ ८.३२.२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:32» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:1» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:2


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

असुरहन्ता प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (य) = जो प्रभु (सृविन्दम्) = सृ-विन्द को [सृ, विन्दति] हमारे पर आक्रमण करके हमारा विदारण कर देनेवाले क्रोध को (वधीत्) = नष्ट करते हैं, वे (उग्रः) = तेजस्वी शत्रुहन्ता प्रभु (अपः रिणन्) = शक्ति के कणों को हमारे में (रिणन्) = प्रेरित करते हैं। क्रोध आदि आसुर भावनायें वीर्यरक्षा के अनुकूल नहीं है। [२] वे प्रभु (अनर्शनिम्) = [ऋश्] जिसका नाश नहीं किया जा सकता उस काम को भी प्रभु ही भस्म करते हैं। (पिप्रुम्) = अपने को ही भरते रहने की स्वार्थभावना को भी प्रभु ही दूर करते हैं। दाशम् उपक्षय कर डालनेवाली, बुद्धि को विनष्ट कर डालनेवाली लोभ वृत्ति को भी ये प्रभु ही समाप्त करते हैं और (अहीशुवम्) = [अहि श्वि] साँप की तरह कुटिल गतिवाली छल-छिद्र की भावना का भी अन्त ये प्रभु ही तो करेंगे [युयोध्यस्मज्जुहुराणम्] ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु हमारे 'क्रोध, काम, स्वार्थ, लोभ या छलकपट' को दूर करें और शक्ति के कणों को हमारे शरीरों में ही प्रेरित करें।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The awful lord of might and action stems the rising wicked, subdues the bullying exploiter, restrains the greedy devourer, cracks the senseless saboteur and the crooked deceiver, and having destroyed the negative forces, releases the free flow of waters and freedom of action, development and progress.