वि षू च॑र स्व॒धा अनु॑ कृष्टी॒नामन्वा॒हुव॑: । इन्द्र॒ पिब॑ सु॒ताना॑म् ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
vi ṣū cara svadhā anu kṛṣṭīnām anv āhuvaḥ | indra piba sutānām ||
पद पाठ
वि । सु । च॒र॒ । स्व॒धाः । अनु॑ । कृ॒ष्टी॒नाम् । अनु॑ । आ॒ऽहुवः॑ । इन्द्र॑ । पिब॑ । सु॒ताना॑म् ॥ ८.३२.१९
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:32» मन्त्र:19
| अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:4» मन्त्र:4
| मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:19
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रभु स्मरण व आत्मधारणशक्ति
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो! आप (स्वधाः अनु) = आत्मधारणशक्तियों के अनुपात में (वि सु चर) = विशेषरूप से हमारे हृदय देशों में सम्यक् गतिवाले होइये । वास्तव में जितना जितना हम आपका हृदय में स्मरण करते हैं, उतना उतना ही आत्मधारण के योग्य बनते हैं । [२] हे प्रभो! आप (कृष्टीनाम्) = श्रमशील मनुष्यों के (अनु आहुवः) = अनुकूलता से आह्वान के योग्य हैं। ये श्रमशील व्यक्ति आपको पुकारते हैं। आपका आराधन ही उन्हें 'कृष्टि' बनाता है। हे (इन्द्र) = शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभो! आप (सुतानाम्) = हमारे शरीरों में उत्पन्न इन सोमों का (पिब) = पान करिये, इसे शरीर में ही सुरक्षित करिये।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु स्मरण हमें आत्मधारणशक्ति देता है, हमें 'कृष्टि' बनाता है, हमारे अन्दर सोम का रक्षण करता है।
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Go forward, Indra, in response to the invitation to yajna of the people and drink of the soma extracted, distilled and offered by them.
