न नू॒नं ब्र॒ह्मणा॑मृ॒णं प्रा॑शू॒नाम॑स्ति सुन्व॒ताम् । न सोमो॑ अप्र॒ता प॑पे ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
na nūnam brahmaṇām ṛṇam prāśūnām asti sunvatām | na somo apratā pape ||
पद पाठ
न । नू॒नम् । ब्र॒ह्मणा॑म् । ऋ॒णम् । प्रा॒शू॒नाम् । अ॒स्ति॒ । सु॒न्व॒ताम् । न । सोमः॑ । अ॒प्र॒ता । प॒पे॒ ॥ ८.३२.१६
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:32» मन्त्र:16
| अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:4» मन्त्र:1
| मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:16
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'ऋणमुक्ति'
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (नूनम्) = निश्चय से (ब्रह्मणाम्) = ज्ञान का पुञ्ज बननेवाले स्वाध्यायशील पुरुषों का (ऋणं न अस्ति) ऋषि ऋण नहीं रहता। स्वाध्याय के द्वारा ज्ञान-वृद्धि करते हुए ये पुरुष ऋषि ऋण से उऋण हो जाते हैं। [२] (प्राशूनाम्) = [अश व्याप्तौ ] यज्ञादि कर्मों में व्याप्त होनेवालों का देवऋण नहीं रहता। यज्ञादि के द्वारा वायु आदि देवों को शुद्ध करते हुए ये पुरुष देवऋण से उऋण हो जाते हैं। [३] (सुन्वताम्) = अपने शरीर में सोम का सम्यक् अभिषव करनेवाले, इस सुरक्षित सोम से उत्तम सन्तान को जन्म देनेवाले पुरुषों का ऋण नहीं है, उत्तम सन्तान को जन्म देकर ये व्यक्ति पितृऋण से उऋण हो जाते हैं। [४] (अप्रता) = [प्रा पूरणे] अपना पूरण न करनेवाले पुरुष से (सोमः) = सोम (न पपे) = नहीं अपने अन्दर पिया जाता। अपना पूरण करनेवाला व्यक्ति सोम को अपने अन्दर सुरक्षित करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम स्वाध्याय द्वारा ज्ञानी बनकर ऋषिऋण से, यज्ञादि कर्मों में व्याप्त होकर देवऋण से तथा सोमरक्षण से उत्तम सन्तान को जन्म देकर पितृऋण से मुक्त हों। अपना पूरण करने की कामनावाले होकर सोम का रक्षण करें।
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - There is no recompense due from men of divinity, from the guests and those actively working for yajna and the extraction of soma. The creator of soma, the giver of knowledge and the social worker do not drink for nothing (they pay with service).
