यः सं॒स्थे चि॑च्छ॒तक्र॑तु॒रादीं॑ कृ॒णोति॑ वृत्र॒हा । ज॒रि॒तृभ्य॑: पुरू॒वसु॑: ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
yaḥ saṁsthe cic chatakratur ād īṁ kṛṇoti vṛtrahā | jaritṛbhyaḥ purūvasuḥ ||
पद पाठ
यः । स॒म्ऽस्थे । चि॒त् । श॒तऽक्र॑तुः । आत् । ई॒म् । कृ॒णोति॑ । वृ॒त्र॒ऽहा । ज॒रि॒तृऽभ्यः॑ । पु॒रु॒ऽवसुः॑ ॥ ८.३२.११
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:32» मन्त्र:11
| अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:3» मन्त्र:1
| मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:11
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'शतक्रतु-पुरुवसु' प्रभु
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो प्रभु (संस्थे) = संग्राम में (चित्) = निश्चय से (शतक्रतुः) = अनन्त कर्मों व शक्तियोंवाले होते हैं, वे (वृत्रहा) = वासना को विनष्ट करनेवाले प्रभु ही (आत्) = अब हमारे से उपासना के किये जाने पर (ईं कृणोति) = खूब ही शत्रुवध आदि कर्मों को करते हैं। [२] ये प्रभु (जरितृभ्यः) = इन स्तोताओं के लिये (पुरुवसुः) = पालक व पूरक धनों को प्राप्त कराते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु उपासक को शक्ति प्राप्त कराते हैं, जिससे वह संग्राम में काम-क्रोध आदि शत्रुओं का विनाश कर सके। ये प्रभु उपासक के लिये पालक व पूरक धनों को प्राप्त कराते हैं।
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - We invoke the lord adorable who does a hundred great favours to the man at peace and, dispelling the darkness in the mind and heart, sublimates the soul too with the spirit of a hundred good works of piety. Indeed, the lord is of infinite wealth, honour and bliss for all his devotees and destroys their evil and ignorance.
