सन्तान निर्माण के लिये परस्पर मेल
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वीतिहोत्रा) = [वीति: प्रियकरः होत्र यज्ञः ययोः] जिनको यज्ञ बड़ा प्रिय है । (कृतद्वसू) = [ याचमान कृतधनौ - पात्रेषूपयुक्तधनौ] पात्रों में धनों को उपयुक्त करनेवाले, अर्थात् जो दानशील हैं। (अमृताय) = अमरण के लिये, नीरोगता के लिये (कम्) = सुखप्रद हविरूप अन्न को (दशस्यन्ता) = देवों के लिये देते हैं। [२] ये पति-पत्नी (अमृताय) = प्रजा के द्वारा अमर बने रहने के लिये (ऊधः) = योनि को तथा (रोमशम्) = रोमयुक्त [ यौवन युक्त] अंग को (संहतः) = संयुक्त करते हैं। केवल सन्तान निर्माण के लिये ही इस मैथुन का प्रयोग करते हैं। और उत्तम सन्तानोंवाले ये पति-पत्नी देवेषु देवों में (दुवः) = परिचर्या-उपासना को (कृणुतः) = करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- आदर्श पति-पत्नी [क] यज्ञशील होते हैं, [ख] दान की वृत्तिवाले बनते हैं,[ग] नीरोगता के लिये हविरूप अन्नों को देनेवाले होते हैं। [घ] सन्तान निर्माण के लिये ही शक्ति का विनियोग करते हैं। [ङ] देवों का उपासन करते हैं।