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तस्य॑ द्यु॒माँ अ॑स॒द्रथो॑ दे॒वजू॑त॒: स शू॑शुवत् । विश्वा॑ व॒न्वन्न॑मि॒त्रिया॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tasya dyumām̐ asad ratho devajūtaḥ sa śūśuvat | viśvā vanvann amitriyā ||

पद पाठ

तस्य॑ । द्यु॒ऽमाम् । अ॒स॒त् । रथः॑ । दे॒वऽजू॑तः । सः । शू॒शु॒व॒त् । विश्वा॑ । व॒न्वन् । अ॒मि॒त्रिया॑ ॥ ८.३१.३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:31» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:38» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:3


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - जो ईश्वर के निकट सर्वभाव से पहुँचता है, (तस्य) उस उपासकजन का (रथः) शरीररूप रथ अथवा अश्वादियुक्त रथ (द्युमान्) दीप्तिमान् और (देवजूतः) शिष्टेन्द्रियों अथवा श्रेष्ठ अश्वों से प्रेरित (असत्) होता है अथवा जिस रथ के चलानेवाले अच्छे-२ विद्वान् होते हैं, तथा (विश्वा) समस्त (अमित्रिया) बाधाओं को (वन्वन्) विनष्ट करता हुआ वह उपासक (शूशुवत्) ज्ञानों, धनों और जनों से संसार में बढ़ता ही रहता है। उसका कदापि भी अधःपतन नहीं होता। यह शिक्षा इस ऋचा से देते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - संसार में उस भक्तजन का परम अभ्युदय फैलता है, शत्रु भी उसके वशीभूत होते हैं, जो अन्तःकरण से परोपकार में लगे रहते हैं और आस्तिकता से जगत् को सुखी करते हैं ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

घुमान् रथः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (तस्य) = उस, गत मन्त्र में वर्णित यज्ञशेष सेवी सोमरक्षक, पुरुष का (रथः) = यह शरीर-रथ (द्युमान् असत्) = ज्योतिर्मय होता है। रक्षित सोम इसकी ज्ञानाग्नि को दीप्त करता है। [२] (देवजूतः) = उस महान् देव प्रभु से प्रेरणा को प्राप्त कराया गया (सः) = वह उपासक (शूशुवत्) = सब दृष्टिकोणों से वृद्धि को प्राप्त करता है। [२] यह (विश्वा) = सब, हमारे अन्दर हमारे न चाहते हुए भी घुस आनेवाली (अमित्रिया) = काम-क्रोध-लोभ आदि शत्रुभूत वासनाओं का (वन्वन्) = यह पराजय करनेवाला होता है। इन वासनाओं का हिंसन करके ही तो यह बढ़ता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - यज्ञशीलता से हमारा शरीर रथ ज्योतिर्मय होता है। यह यज्ञशील पुरुष प्रभु प्रेरणा को प्राप्त करके वृद्धि को प्राप्त होता है। यह सब शत्रुभूत वासनाओं को हिंसित करता है।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - यः खलु ईश्वरसान्निध्यमुप धावति। तस्य। रथः शरीररूपः अश्वादियुक्तो वा। द्युमान् दीप्तिमान्। देवजूतः देवैः शिष्टेन्द्रियैः श्रेष्ठैरश्वैर्वा प्रेरितो भवति। शरीरे इन्द्रियाणि सर्वदेवेष्टमाचरन्ति। स पुनरुपासकः। विश्वा=विश्वानि सर्वाणि। अमित्रिया=अमित्रियान् परोत्पादितान् बाधान्। वन्वन् हिंसन् सन्। शूशुवत् धनैर्ज्ञानैर्लोकैश्च वर्धत एव। न कदापि तस्याधः पतनं भवतीति अनया शिक्षते ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - His chariot would shine with wealth and lustre and he, inspired by divinity, would rise in life with wealth and knowledge, honour and social prestige, removing obstructive difficulties and adversities from his path of progress.