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अस॒दत्र॑ सु॒वीर्य॑मु॒त त्यदा॒श्वश्व्य॑म् । दे॒वानां॒ य इन्मनो॒ यज॑मान॒ इय॑क्षत्य॒भीदय॑ज्वनो भुवत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asad atra suvīryam uta tyad āśvaśvyam | devānāṁ ya in mano yajamāna iyakṣaty abhīd ayajvano bhuvat ||

पद पाठ

अस॑त् । अत्र॑ । सु॒ऽवीर्य॑म् । उ॒त । त्यत् । आ॒शु॒ऽअश्व्य॑म् । दे॒वाना॑म् । यः । इत् । मनः॑ । यज॑मानः । इय॑क्षति । अ॒भि । इत् । अय॑ज्वनः । भु॒व॒त् ॥ ८.३१.१८

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:31» मन्त्र:18 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:40» मन्त्र:8 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:18


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (अत्र) इस परमात्मोपासक जन में (सुवीर्यम्) शारीरिक और मानसिक बल (असत्) सदा बढ़ता ही रहता है (उत) और (आश्वश्व्यम्) शीघ्रगामी घोड़े आदि पशुसमूह (त्यत्) प्रसिद्ध धन उस उपासक के निकट बहुत होता है। पूर्ववत्। (यजमानः) जो यजमान (देवानाम्) विद्वानों के (मनः+इत्) मन को ही (इयक्षति) अपने आचरणों से वश में करता है (अयज्वनः) वह अयजनशील नास्तिकों का (अभि+भुवत्+इत्) अवश्य ही अभिभव करता है ॥१८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुवीर्यं, आशु अश्व्यम्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः यजमानः) = जो यज्ञशील पुरुष (देवानां मनः) = देवों के मन को, दिव्य गुण सम्पन्न मन को (इत्) = निश्चय से (इयक्षति) = अपने साथ जोड़ने की कामना करता है, वह (इत्) = निश्चय ही (अयज्वनः) = अयज्ञशीलों को (अभिभवत्) = अभिभूत कर लेता है। [२] (अत्र) = इस यजमान के जीवन में (सुवीर्यं असत्) = उत्कृष्ट वीर्य होता है, (उत) = और (त्यत्) = वह प्रसिद्ध आशु शीघ्रगामी (अश्व्यम्) = इन्द्रियाश्वों का समूह होता है, यज्ञशील पुरुष उत्कृष्ट वीर्य को व स्फूर्तिमय इन्द्रिय समूह को प्राप्त करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम यज्ञशील बनकर मन को दिव्य गुण सम्पन्न बनायें। इससे हमें सुवीर्य व उत्तम इन्द्रिय समूह की प्राप्ति होगी। इन उत्तम इन्द्रियों के द्वारा हम ज्ञान-वर्धन करते हुए तथा सुवीर्य द्वारा ज्ञानाग्नि को दीप्त करते हुए 'मेधातिथि' बनते हैं, निरन्तर बुद्धि की ओर चलनेवाले। ऐसा होने पर हम 'काण्व' कण्व पुत्र अतिशयेन मेधावी होते हैं। मेधातिथि इन्द्र का उपासन करता हुआ कहता है-
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - अत्र अस्मिन् परमात्मोपासके जने। सुवीर्यम्। असत् भवति। शारीरं मानसिकञ्च बलं तस्मिन् सदा वर्धते। उत अपि च। आश्वश्व्यम् आशुगामि अश्वादिप्राणिजातम्। त्यत् तत्प्रसिद्धं धनम्। तस्मिन् जायते। यश्च यजमानः देवानां विदुषाञ्च। मन इत् मन एव स्वाचरणैः। इयक्षति पूजयति वशीकरोति। सः अयज्वनो नास्तिकान्। अभि। भुवत्+इत्=अभिभवत्येव ॥१८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May there be heroic power and prowess, fast victory and life’s fulfilment for him who performs yajna in service to the divinities of nature and humanity with truth of mind and action, and may he surpass all those uncharitables who perform no selfless service in creative action to divinity and humanity.