पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः यजमानः) = जो यज्ञशील पुरुष (देवानां मनः) = देवों के मन को, दिव्य गुण सम्पन्न मन को (इत्) = निश्चय से (इयक्षति) = अपने साथ जोड़ने की कामना करता है, वह (इत्) = निश्चय ही (अयज्वनः) = अयज्ञशीलों को (अभिभवत्) = अभिभूत कर लेता है। [२] (अत्र) = इस यजमान के जीवन में (सुवीर्यं असत्) = उत्कृष्ट वीर्य होता है, (उत) = और (त्यत्) = वह प्रसिद्ध आशु शीघ्रगामी (अश्व्यम्) = इन्द्रियाश्वों का समूह होता है, यज्ञशील पुरुष उत्कृष्ट वीर्य को व स्फूर्तिमय इन्द्रिय समूह को प्राप्त करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम यज्ञशील बनकर मन को दिव्य गुण सम्पन्न बनायें। इससे हमें सुवीर्य व उत्तम इन्द्रिय समूह की प्राप्ति होगी। इन उत्तम इन्द्रियों के द्वारा हम ज्ञान-वर्धन करते हुए तथा सुवीर्य द्वारा ज्ञानाग्नि को दीप्त करते हुए 'मेधातिथि' बनते हैं, निरन्तर बुद्धि की ओर चलनेवाले। ऐसा होने पर हम 'काण्व' कण्व पुत्र अतिशयेन मेधावी होते हैं। मेधातिथि इन्द्र का उपासन करता हुआ कहता है-