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म॒क्षू दे॒वव॑तो॒ रथ॒: शूरो॑ वा पृ॒त्सु कासु॑ चित् । दे॒वानां॒ य इन्मनो॒ यज॑मान॒ इय॑क्षत्य॒भीदय॑ज्वनो भुवत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

makṣū devavato rathaḥ śūro vā pṛtsu kāsu cit | devānāṁ ya in mano yajamāna iyakṣaty abhīd ayajvano bhuvat ||

पद पाठ

म॒क्षु । दे॒वऽव॑तः । रथः॑ । शूरः॑ । वा॒ । पृ॒त्ऽसु । कासु॑ । चि॒त् । दे॒वाना॑म् । यः । इत् । मनः॑ । यज॑मानः । इय॑क्षति । अ॒भि । इत् । अय॑ज्वनः । भु॒व॒त् ॥ ८.३१.१५

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:31» मन्त्र:15 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:40» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:15


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (देववतः) देववान् अर्थात् एक परमात्मोपासक जन का (रथः) रमणीय वाहन (मक्षु) शीघ्र सर्वत्र सुप्रसिद्ध होता है (वा) अथवा वह स्वयम् (कासुचित्) किन्हीं (पृत्सु) सेनाओं में (शूरः) नायक होता है और (यः) जो (यजमानः) सदा परमात्मा के गुणों का यजन करनेवाला है और जो (देवानाम्) दिव्यगुणसम्पन्न पुरुषों के (मन+इत्) मन को ही (इयक्षति) अपने अनुकूल आचरणों से तथा ईश्वर की आज्ञा पर चलने से पूजता है अर्थात् आदर-सत्कार करता है, वह (अयज्वनः) न यज्ञ करनेवाले नास्तिकों का (अभि+भुवत्+इत्) अवश्य ही अभिभव करता है ॥१५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

देववान् का गतिशील रथ

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (देववतः) = उस देववाले प्रभु के उपासक का (रथः) = यह शरीर रथ (मक्षू) = शीघ्र गतिवाला होता है। यह उपासक (कासुचित् पृत्सु) = किन्हीं भी शत्रु सेनाओं में (वा) = निश्चय से (शूरः) = शत्रुओं को शीर्ण करनेवाला होता है। [२] (यः यजमानः) = जो यज्ञशील पुरुष (इत्) = निश्चय से (देवानां मनः) -= देवों के मन को (इयक्षति) = अपने साथ संगत करने का प्रयत्न करता है, अर्थात् अपने मन को दिव्य बनाने की कोशिष करता है। यह (इत्) = निश्चय से (अयज्वनः) = अयज्ञशील पुरुषों को (अभिभुवत्) = अभिभूत करनेवाला होता है। यज्ञशील पुरुष दिव्य मनवाला बनकर अयज्ञशीलों को परास्त कर पाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु के उपासक का शरीर रथ गतिशील होता है। यह उपासक संग्रामों में शत्रुओं को शीर्ण करता है। यज्ञशील बनकर देववृत्ति का बनता है और अयज्ञशील पुरुषों को अभिभूत करनेवाला होता है।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - देववतः देवः परमात्मा आराध्यतया विद्यते यस्य स देवान् तस्य देवोपासकस्य पुरुषस्य। रथो रमणीयो वाहनो मक्षु शीघ्रं प्रसिद्धतरो जायते। वा अथवा। स स्वयम् कासुचित् पृत्सु पृतनासु सेनासु मध्ये। शूरो नायको भवति। ये यजमान उपासकः यश्च। देवानां दिव्यगुणसम्पन्नानाम्। मन इत् मन एव। इयक्षति यष्टुमिच्छति। सः। अयज्वनो नास्तिकान् जनान्। अभि+भुवत्+इत्=अभिभवत्येव ॥१५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The chariot of the man of reverence to divinities moves fast forward, and the hero himself, who, with sincere mind and action, performs yajna and offers service to the divinities, goes far forward in the battles of life and surpasses the uncharitables who perform no yajna in the service of humanity and divinity.