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यद्वा॑भिपि॒त्वे अ॑सुरा ऋ॒तं य॒ते छ॒र्दिर्ये॒म वि दा॒शुषे॑ । व॒यं तद्वो॑ वसवो विश्ववेदस॒ उप॑ स्थेयाम॒ मध्य॒ आ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yad vābhipitve asurā ṛtaṁ yate chardir yema vi dāśuṣe | vayaṁ tad vo vasavo viśvavedasa upa stheyāma madhya ā ||

पद पाठ

यत् । वा॒ । अ॒भि॒ऽपि॒त्वे । अ॒सु॒राः॒ । ऋ॒तम् । य॒ते । छ॒र्दिः । ये॒म । वि । दा॒शुषे॑ । व॒यम् । तत् । वः॒ । व॒स॒वः॒ । वि॒श्व॒ऽवे॒द॒सः॒ । उप॑ । स्थे॒या॒म॒ । मध्ये॒ । आ ॥ ८.२७.२०

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:27» मन्त्र:20 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:34» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:20


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शिव शंकर शर्मा

यह प्रार्थना विद्वानों की गोष्ठी के लाभ के लिये है।

पदार्थान्वयभाषाः - (यद्वा) अथवा (असुराः) हे महाबलप्रद सर्वप्रतिनिधियो ! जब आप (अभिपित्वे) सायंकाल अथवा अन्य समयों में अथवा किसी समय में (ऋतम्+यते) सत्यनियम, सत्यव्रत, सत्यबोध आदिकों को प्राप्त और (दाशुषे) यथाशक्ति दानदाता के लिये (छर्दिः) गृह, दारा, पुत्र और बहुविध पदार्थ (वि+येम) देते हैं (वसवः) हे सबके वास देनेवाले (विश्ववेदसः) हे सर्वधनसम्पन्न विद्वानो ! (तत्) तब (वयम्) हम चाहते हैं कि (वः+मध्ये) आप लोगों के मध्य (आ) सब प्रकार से (उपस्थेयाम) उपस्थित होवें, क्योंकि आपके सङ्ग-२ हम भी उदार होवें ॥२०॥
भावार्थभाषाः - विद्वानों के साथ-२ रहने से बहुविध लाभ हैं। आत्मा पवित्र होता, उदारता आती, बहुज्ञता बढ़ती और परोपकार करने से जन्मग्रहण की सफलता होती है ॥२०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ऋतं यते, दाशुषे

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (असुराः) = हमारे जीवनों में प्राणशक्ति का संचार करनेवाले [असु+र] अथवा शत्रुओं को दूर फेंकनेवाले [अस् क्षेपणे] देवो! आप (अभिपित्वे) = हमारे यज्ञों में प्राप्त होने पर (ऋतं यते) = यज्ञों की ओर गतिवाले, (यद्वा) = अथवा (दाशुषे) = दानशील पुरुष के लिये (छर्दिः वियेम) = गृह को देते हो। (वयम्) = हम (वः) = आपके (तद् मध्ये) = उस घर में (उप आ स्थेयाम) = उपासना में स्थित हों। [२] हे देवो! आप (वसवः) = हमारे निवास को उत्तम बनानेवाले से और (विश्ववेदसः) = सम्पूर्ण धनों व ज्ञानों को प्राप्त करानेवाले हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम अपने गृह को उन व्यक्तियों का गृह बनायें जो ऋत की ओर चल रहे हैं, यज्ञात्मक जीवन बिता रहे हैं और दानशील हैं। सब देव हमारे निवास को उत्तम बनायेंगे और सम्पूर्ण धनों को प्राप्त करायेंगे।
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शिव शंकर शर्मा

विद्वद्गोष्ठीलाभाय प्रार्थना।

पदार्थान्वयभाषाः - यद्वा। हे असुराः=“असून् प्राणान् रान्ति ददति ये तेऽसुराः” महाप्राणप्रदातारः ! यूयम्। यदा। अभिपित्वे=सायंकाले। अन्येषु समयेषु वा। ऋतम्+यते=सत्यं गच्छते। “इणः शतरि रूपम्”। दाशुषे=दत्तवते जनाय। छर्दिः=गृहम्। अन्यानि विविधानि वित्तानि च। वियेम=प्रयच्छथ। हे वसवः ! हे विश्ववेदसः ! तत्=तदा। वः=युष्माकं मध्ये। वयम्। आ=समन्तात्। उपस्थेयाम=उपतिष्ठेम ॥२०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The devotee having offered service in worship of truth and divine law, morning, evening or any time, you bless the man of charity with a peaceful home, then, O harbingers of pranic energy, and commanders of the world’s wealth and givers of peace and shelter, pray may we too abide in your midst close to you under your protection and care.