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व॒यं हि वां॒ हवा॑मह उक्ष॒ण्यन्तो॑ व्यश्व॒वत् । सु॒म॒तिभि॒रुप॑ विप्रावि॒हा ग॑तम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vayaṁ hi vāṁ havāmaha ukṣaṇyanto vyaśvavat | sumatibhir upa viprāv ihā gatam ||

पद पाठ

व॒यम् । हि । वा॒म् । हवा॑महे । उ॒क्ष॒ण्यन्तः॑ । व्य॒श्व॒ऽवत् । सु॒म॒तिऽभिः॑ । उप॑ । वि॒प्रौ॒ । इ॒ह । आ । ग॒त॒म् ॥ ८.२६.९

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:26» मन्त्र:9 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:27» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:9


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शिव शंकर शर्मा

पुनः उसी विषय को कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - हे राजन् तथा मन्त्रिदल ! (उक्षण्यन्तः) धनस्वामी और रक्षक को अपने लिये चाहते हुए हम लोग (हि) निश्चितरूप से (व्यश्ववत्) जितेन्द्रिय ऋषि के समान (वाम्+हवामहे) प्रत्येक शुभकर्म में आपको बुलाते हैं, (विप्रौ) हे मेधावि राष्ट्रदल (सुमतिभिः) सुन्दर बुद्धियों और बुद्धिमान् पुरुषों के साथ (इह) इस यज्ञ में (उपागतम्) आकर विराजमान हूजिये ॥९॥
भावार्थभाषाः - प्रजागण राजदल के साथ प्रेम और विश्वास करें और राजदल प्रजाओं के हित में सदा लगे रहें ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्राणसाधना के तीन लाभ

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्राणापानो! (वयम्) = हम (उक्षण्यन्तः) = शरीर में शक्ति के सेचन की कामना करते हुए (हि) = निश्चय से (वाम्) = आपको (हवामहे) = पुकारते हैं। आपके द्वारा ही तो हम इस वीर्यशक्ति को शरीर में सिक्त कर पायेंगे। हम आपको व्यश्ववत् 'व्यश्व' की तरह पुकारते हैं । [२] हे (विप्रौ) = हमारा विशेषरूप से पूरण करनेवाले प्राणापानो! आप (सुमतिभिः) = कल्याणी मतियों के साथ (इह) = इस जीवनयज्ञ में हमें (उपागतम्) = समीपता से प्राप्त होवो । प्राणसाधना के द्वारा शक्ति का सेचन होकर बुद्धि की सूक्ष्मता भी प्राप्त होती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना से [क] शरीर में शक्ति का सुरक्षण होगा, [ख] हमारे इन्द्रियाश्व उत्तम बनेंगे, [ग] हमारी बुद्धि सूक्ष्म होगी।
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शिव शंकर शर्मा

पुनस्तदेवाह।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अश्विनौ ! उक्षण्यन्तः=उक्षाणौ=धनादिवर्षणकर्त्तारौ। युवाम्। आत्मन इच्छन्तो वयम्। हि। व्यश्ववत्=जितेन्द्रियर्षिवत्। वां हवामहे। हे विप्रौ=मेधाविनौ ! युवाम्। सुमतिभिः। इह। उपागतम्=उपागच्छतम् ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Like the holy sage of mental and moral discipline, we invoke and invite you, lords of the showers of generosity. Come to us, O vibrant powers, with holy thoughts and intentions and with the sages of noble mind.