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ता वा॑म॒द्य ह॑वामहे ह॒व्येभि॑र्वाजिनीवसू । पू॒र्वीरि॒ष इ॒षय॑न्ता॒वति॑ क्ष॒पः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tā vām adya havāmahe havyebhir vājinīvasū | pūrvīr iṣa iṣayantāv ati kṣapaḥ ||

पद पाठ

ता । वा॒म् । अ॒द्य । ह॒वा॒म॒हे॒ । ह॒व्येभिः॑ । वा॒जि॒नी॒व॒सू॒ इति॑ वाजिनीऽवसू । पू॒र्वीः । इ॒षः । इ॒षय॑न्तौ । अति॑ । क्ष॒पः ॥ ८.२६.३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:26» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:26» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:3


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शिव शंकर शर्मा

राजकर्म कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (वाजिनीवसू) हे अन्नादि परिपूर्ण धनवाले राजन् तथा मन्त्रिदल ! (ता+वाम्) उन आप सबको (अद्य) आज (अति+क्षपः) रात्रि के बीतने के पश्चात् अर्थात् प्रातःकाल (हवामहे) आदर के साथ बुलाते हैं (हव्येभिः) स्तुतियों के द्वारा आपका सत्कार करते हैं, आप सब (पूर्वीः+इषः) बहुत से धनों को (इषयन्तौ) इकट्ठा करने के लिये इच्छा करें ॥३॥
भावार्थभाषाः - राजा को उचित है कि प्रजा के हित के लिये बहुत सा धन एकत्रित कर रक्खें ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

इषः इषयन्तौ [अश्विनौ]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (वाजिनीवसू) = शक्तिरूप धनोंवाले प्राणापानो! (ता वाम्) = उन आपको (अद्य) = आज (हव्येभिः) = हव्य पदार्थों के साथ (हवामहे =) हम पुकारते हैं । प्राणसाधना के साथ हव्य पदार्थों का सेवन आवश्यक है। आराधित प्राणापान हमारे लिये शक्तिरूप धनों को प्राप्त कराते हैं । [२] उन आपको हम पुकारते हैं, जो आप (अतिक्षप:) = [ क्षपायाः अति क्रमे] अज्ञान रात्रि के समाप्त होने पर (पूर्वी:) = हमारा पालन व पूरण करनेवाली (इषः) = प्रभु प्रेरणाओं को (इषयन्तौ) = हमारे लिये प्रेरित करते हो, प्राणसाधना से अज्ञानान्धकार का विनाश होता है। हृदयस्थ प्रभु की प्रेरणायें सुनाई पड़ती हैं। ये प्रेरणायें हमारा पालन व पूरण करती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना के साथ यज्ञिय सात्त्विक आहार का ही सेवन करना चाहिये। ये प्राणापान अज्ञानान्धकार का ध्वंस करके हमें प्रभु प्रेरणा के सुनने के योग्य बनाते हैं, ये प्रेरणायें ही हमारा पालन व पूरण करती हैं।
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शिव शंकर शर्मा

राजकर्माण्याह।

पदार्थान्वयभाषाः - हे वाजिनीवसू=हे वर्षणशीलधनवन्तौ ! हे विज्ञानधनवन्तौ ! ता+वाम्=तौ युवाम्। अद्य=अस्मिन् दिने। अति+क्षपः=क्षपाया रात्रेः अतिक्रमे। हव्येभिः=हविर्लक्षणैः स्तोत्रैः सह। हवामहे। कीदृशौ। पूर्वीः=बह्वीः। इषः=अन्नानि। इषयन्तौ=इच्छन्तौ ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, lovers of food and energy and total well being of a life of universal values, harbingers of new victories in the advancement of power and prosperity, at this hour of the dawn when the night is gone, we invoke you with offers of the sweetest fragrances of homage and yajnic service.