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उ॒त स्या श्वे॑त॒याव॑री॒ वाहि॑ष्ठा वां न॒दीना॑म् । सिन्धु॒र्हिर॑ण्यवर्तनिः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uta syā śvetayāvarī vāhiṣṭhā vāṁ nadīnām | sindhur hiraṇyavartaniḥ ||

पद पाठ

उ॒त । स्या । श्वे॒त॒ऽयाव॑री । वाहि॑ष्ठा । वा॒म् । न॒दीना॑म् । सिन्धुः॑ । हिर॑ण्यऽवर्तनिः ॥ ८.२६.१८

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:26» मन्त्र:18 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:29» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:18


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शिव शंकर शर्मा

राजा कैसे हों, यह दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (उत) और भी (नदीनाम्) इन्द्रियरूप नदियों के मध्य (स्या) श्वेतयावरी वह बुद्धि, जो सात्त्विक भाव को प्रकाश करती है और जिसमें किञ्चिन्मात्र कलङ्क नहीं है, (वाम्+वाहिष्ठा) आप के यशों को प्रजाओं में पहुँचाया करती है और (हिरण्यवर्तनिः+सिन्धुः) शोभनमार्गगामी स्यन्दनशील विवेक भी तुम्हारा ही गुणगान करता है ॥१८॥
भावार्थभाषाः - गुणवान् शीलवान् राजा की प्रशंसा सब करें करावें ॥१८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्राणसाधक पुरुष व स्त्री

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्राणापानो! (उत) = और निश्चय से (स्या) = वह स्त्री (वाम्) = आपकी है, आपकी उपासना करनेवाली है जो (श्वेत या वरी) = शुद्ध मार्ग से गति करनेवाली है और (नदीनाम्) = समृद्धियों की (वाहिष्ठा) = वोढ़तमा बनती है। प्राणसाधिका स्त्री का जीवन शुद्ध व समृद्ध बनता है। [२] प्राणसाधक पुरुष, हे प्राणापानो ! जो पुरुष आपकी साधना करता है, वह (सिन्धुः) = [सिनाति दधाति च] शक्ति को अपने में बाँधनेवाला होता है और इस प्रकार अपना धारण करनेवाला बनता है। यह (हिरण्यवर्तनिः) = ज्योतिर्मय मार्गवाला होता है। स्वाध्याय द्वारा अपनी ज्ञान-ज्योति को बढ़ानेवाला होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना से 'शुद्धता, ऐश्वर्य, शक्ति व ज्योति' प्राप्त होती है।
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शिव शंकर शर्मा

राजा कीदृशो भवेदिति दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः - उत=अपि च। नदीनां मध्ये। स्या=सा। श्वेतयावरी− श्वेतया=श्वेतज्ञानजलेन यातीति श्वेतयावरी=बुद्धिः। वाम्=युवयोः। वाहिष्ठा=अतिशयेन यशोवोढ्री। पुनः। हिरण्यवर्तनिः=कनकमार्गः। सिन्धुः=स्यन्दनशीलो विवेकोऽपि। युवां स्तौति ॥१८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And of the fluent media of communication, the most effective is that transparent, unpolluted, stream of thought, discrimination and judgement, the intelligence, Buddhi, golden stream of the speed of mind.