वांछित मन्त्र चुनें

अ॒स्मभ्यं॒ सु वृ॑षण्वसू या॒तं व॒र्तिर्नृ॒पाय्य॑म् । वि॒षु॒द्रुहे॑व य॒ज्ञमू॑हथुर्गि॒रा ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asmabhyaṁ su vṛṣaṇvasū yātaṁ vartir nṛpāyyam | viṣudruheva yajñam ūhathur girā ||

पद पाठ

अ॒स्मभ्य॑म् । सु । वृ॒ष॒ण्व॒सू॒ इति॑ वृषण्ऽवसू । या॒तम् । व॒र्तिः । नृ॒ऽपाय्य॑म् । वि॒षु॒द्रुहा॑ऽइव । य॒ज्ञम् । ऊ॒ह॒थुः॒ । गि॒रा ॥ ८.२६.१५

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:26» मन्त्र:15 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:28» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:15


0 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

पुनः वही विषय आ रहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - (वृषण्वसू) हे धनवर्षिता अश्विद्वय ! (अस्मभ्यम्) हमारे कल्याण के लिये आप सब (सुयातम्) अच्छे प्रकार आवें और (नृपाय्यम्) मनुष्यों के रक्षणीय और आश्रय (वर्तिः) जो मेरे गृह और यज्ञशाला हैं, वहाँ आकर विराजमान होवें (विषुद्रुहा+इव) जैसे बाण की सहायता से वीर रक्षा करते हैं, वैसे ही (गिरा) स्तुतियों से प्रसन्न होकर (यज्ञम्) प्रजाओं के शुभकर्म की (उहथुः) रक्षा और भार उठावें ॥१५॥
भावार्थभाषाः - राजवर्ग को उचित है कि प्रजाओं के कल्याणार्थ सदा चेष्टा करें, उनके साधनों में आलस्य न करें, क्योंकि राजवर्ग प्रजाओं की रक्षा के लिये ही नियुक्त किये गये हैं ॥१५॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्राणसाधना व प्रभु-दर्शन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (असम्भ्यम्) = हमारे लिये हे (वृषण्वसू) = सुखों के वर्षणशील धनोंवाले प्राणापानो! आप (नृपाय्यम्) = उन्नतिपथ पर ले चलनेवाले आप द्वारा पातव्य सोम का लक्ष्य करके (वर्ति:) = हमारे शरीर गृह को (सुयातम्) = सम्यक् प्राप्त होवो। हमारे शरीर गृह में प्राणापान की साधना चलेगी तो सोम का भी रक्षण होगा और सोमरक्षण द्वारा सब सुख वर्षक धन प्राप्त होंगे। [२] हे प्राणापानो! जैसे (विषुद्रुहा) = [विसु द्रुहन्ति अनेन] शर के द्वारा व्याध मृग को अपने समीप प्राप्त कराता है, इसी प्रकार हे प्राणापानो! आप (गिरा) = ज्ञान की वाणियों के साथ (यज्ञम्) = उस उपासनीय प्रभु को (ऊहथुः) = हमारे समीप प्राप्त कराते हो। प्राणसाधना से ज्ञानवृद्धि होती है और विवेकख्याति के द्वारा आत्मदर्शन होता है। यह साधक प्राणों द्वारा मन को वशीभूत करके आत्मदर्शन करनेवाला बनता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना से ज्ञानवृद्धि होकर उस उपासनीय प्रभु का दर्शन होता है।
0 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

पुनस्तदेवानुवर्तते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे वृषण्वसू=हे धनवर्षितारौ ! अस्मभ्यम्। सुयातम्। नृपाय्यम्=नृभिर्नेतृभिः पालनीयम्। वर्तिर्गृहम्। सुयातम्। पुनः। विषुद्रुहा+इव=बाणेन इव। यथा वीरो बाणेन सहायेन रक्षति तथैव। गिरा=स्तुत्या। यज्ञम्=कर्म प्रजानाम्। युवाम्। ऊहथुः=वहतम् ॥१५॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Lords of the yajnic showers of prosperity, come straight like an arrow, visit our hall of yajna dedicated to the good of humanity and guide and upraise our yajna with the holy chant of Vedic voice.