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यो वा॑मुरु॒व्यच॑स्तमं॒ चिके॑तति नृ॒पाय्य॑म् । व॒र्तिर॑श्विना॒ परि॑ यातमस्म॒यू ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yo vām uruvyacastamaṁ ciketati nṛpāyyam | vartir aśvinā pari yātam asmayū ||

पद पाठ

यः । वा॒म् । उ॒रु॒व्यचः॑ऽतमम् । चिके॑तति । नृ॒ऽपाय्य॑म् । व॒र्तिः । अ॒श्वि॒ना॒ । परि॑ । या॒त॒म् । अ॒स्म॒यू इत्य॑स्म॒ऽयू ॥ ८.२६.१४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:26» मन्त्र:14 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:28» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:14


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शिव शंकर शर्मा

पुनः उसी की अनुवृत्ति आती है।

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो भक्तजन (उरुव्यचस्तमम्) बहुविस्तृत और बहुयशस्कर (नृपाय्यम्) मनुष्यग्रहणयोग्य स्तोत्र को (वाम्) आप लोगों के लिये (चिकेतति) जानता है, (अश्विना) हे अश्विद्वय (वर्तिः) उसके गृह को (अस्मयू) मनुष्यमात्र को चाहनेवाले आप (परियातम्) जाकर भूषित कीजिये ॥१४॥
भावार्थभाषाः - जो कवि और विद्वान् आदि काव्य और शास्त्र रचें, वे राज्य की ओर से पूजनीय और पोषणीय हैं ॥१४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अश्विनीदेवों का सोमपान

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो भी (उरुव्यचस्तमम्) = अतिशयेन शक्तियों के विस्तारवाले, (नृपाय्यम्) = उन्नतिपथ पर ले चलनेवाले प्राणापानों से (पातव्य) = सोम को [वीर्य शक्ति को] (वाम्) = आपके लिये देना चिकेतति जानता है, अर्थात् जो आपकी साधना के द्वारा सोम को शरीर में ही सुरक्षित करना जानता है। हे प्राणापानो! (अस्मयू) = हमारे हित की कामनावाले आप उस पुरुष के (वर्तिः) = इस शरीर गृह को (परियातम्) = प्राप्त होवो। [२] जो व्यक्ति यह समझता है कि सोमरक्षण द्वारा अधिक से अधिक शक्तियों का विस्तार होगा तथा जो यह जानता है कि प्राणसाधना से ही सोम का शरीर में रक्षण होगा यह अवश्य प्राणसाधना में प्रवृत्त होता है। यही प्राणापान का हमारे शरीर गृह में प्राप्त होना है। इससे सोम शरीर में ही सुरक्षित होता है। यही अश्विनी देवों का सोमपान है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारे हित की कामनावाले प्राणापान हमारे शरीर गृह में प्राप्त हों। हम इनके पूजन के द्वारा सोम को शरीर में ही सुरक्षित करनेवाले बनें। शरीर में सुरक्षित सोम सब शक्तियों के विस्तार का कारण बने।
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शिव शंकर शर्मा

पुनस्तदनुवर्तते।

पदार्थान्वयभाषाः - यो जनः। उरुव्यचस्तमम्=बहुयशस्करम्। नृपाय्यम्=मनुष्यग्रहणीयं स्तोत्रम्। वाम्=युष्मदर्थम्। चिकेतति=जानाति=करोतीत्यर्थः। हे अश्विना=हे अश्विनौ। तस्य। वर्त्तिः=गृहम्। अस्मयू=अस्मान् कामयमानौ। युवाम्। परियातम्=प्रतिगच्छतम् ॥१४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, lovers and benefactors of ours, one who reserves and assigns a spacious hall comfortably good for distinguished congregations of yajna in your honour, you oblige and visit his home in recognition.