पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो भी (उरुव्यचस्तमम्) = अतिशयेन शक्तियों के विस्तारवाले, (नृपाय्यम्) = उन्नतिपथ पर ले चलनेवाले प्राणापानों से (पातव्य) = सोम को [वीर्य शक्ति को] (वाम्) = आपके लिये देना चिकेतति जानता है, अर्थात् जो आपकी साधना के द्वारा सोम को शरीर में ही सुरक्षित करना जानता है। हे प्राणापानो! (अस्मयू) = हमारे हित की कामनावाले आप उस पुरुष के (वर्तिः) = इस शरीर गृह को (परियातम्) = प्राप्त होवो। [२] जो व्यक्ति यह समझता है कि सोमरक्षण द्वारा अधिक से अधिक शक्तियों का विस्तार होगा तथा जो यह जानता है कि प्राणसाधना से ही सोम का शरीर में रक्षण होगा यह अवश्य प्राणसाधना में प्रवृत्त होता है। यही प्राणापान का हमारे शरीर गृह में प्राप्त होना है। इससे सोम शरीर में ही सुरक्षित होता है। यही अश्विनी देवों का सोमपान है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारे हित की कामनावाले प्राणापान हमारे शरीर गृह में प्राप्त हों। हम इनके पूजन के द्वारा सोम को शरीर में ही सुरक्षित करनेवाले बनें। शरीर में सुरक्षित सोम सब शक्तियों के विस्तार का कारण बने।