पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो भी व्यक्ति हे प्राणापानो ! (वाम्) = आपके (यज्ञेभिः) = यज्ञों से, पूजनों से (आवृतः) = समन्तात् इस प्रकार आवृत होता है, (इव) = जैसे (अधिवस्त्रा वधूः) = उत्कृष्ट वस्त्रों को धारण किये हुए वधू । हे (अश्विना) = प्राणापानो! आप उसे (सपर्यन्ता) = अभीष्ट ज्ञान व शक्ति के दान से पूजित करते हुए (शुभे चक्राते) = सदा मंगल कार्यों में व्यापृत करते हो। [२] मनुष्य प्राण-साधना से अपने जीवन को इस प्रकार आवृत कर ले, जैसे एक वधू वस्त्रों से अपने शरीर को आवृत करती है। वधू की शोभा अपने अंगों को वस्त्रों से आवृत किये हुए होने में ही है। इसी प्रकार मनुष्य की शोभा इसी में है कि वह अपने प्रत्येक दिन को प्राणसाधना से आवृत कर ले, प्रात: भी प्राणसाधना, सायं भी प्राणसाधना । ये प्राणापान ज्ञान व शक्ति आदि इष्ट पदार्थों को प्राप्त करायेंगे और हमें सदा शुभ वृत्तिवाला बनायेंगे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना हमारे जीवन की रक्षिका बन जाये। यह हमें ज्ञान व शक्ति आदि अभीष्ट वस्तुओं को प्राप्त कराती हुई सदा शुभ कार्यों में प्रवृत्त रखेगी।