युवादत्त 'धिषणा', युवानीत 'शक्ति'
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (दिष्ण्या) = [धिषणार्हो] स्तुति के योग्य अथवा उत्तम बुद्धि को प्राप्त करानेवाले [धिषणा = बुद्धि] (वृषणा) = शक्ति का शरीर में सेचन करनेवाले प्राणापानो ! (युवादत्तस्य) = आप से दिये जानेवाले ज्ञान को तथा (युवानीतस्य) = आप से आनीत [ प्राप्त करायी जानेवाली] शक्ति को (सूरिभिः)= ज्ञानी स्तोताओं के सम्पर्क के द्वारा (अहरहः) = प्रतिदिन (मह्यम्) = मेरे लिये (शिक्षतम्) = दीजिये । [२] ज्ञानी स्तोताओं के सम्पर्क में हम भी ज्ञान की रुचिवाले बनेंगे तथा विषय वासनाओं में न फँसने के कारण शक्ति को प्राप्त करनेवाले होंगे। ज्ञानी स्तोताओं के सम्पर्क की ओर झुकाव इस प्राणापान की साधना से ही होगा। एवं यह साधना हमें ज्ञान व शक्ति को प्राप्त करानेवाली बनेगी।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हे प्राणापानो! हम आप से दत्त ज्ञान को तथा आप से प्राप्त करायी गयी शक्ति को ज्ञानियों के सम्पर्क में रहते हुए प्राप्त करें।