पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे अश्विनौ [प्राणापानो] ! (युवो:) = आप के निश्चय से (रथम्) = इस शरीररूप रथ को (सु हुवे) = सम्यक् पुकारता हूँ। (सूरिषु) = ज्ञानी पुरुषों में (सधस्तुत्याय) = मिलकर स्तुति करने योग्य उस प्रभु की प्राप्ति के लिये । प्रभु की प्राप्ति इस प्राणापान के रथ के द्वारा ही होती है। अर्थात् प्राणायाम द्वारा चित्तवृत्ति निरोध के होने पर ही प्रभु का साक्षात्कार होता है। इस प्रभु का ज्ञानी लोग मिलकर स्तवन करते हैं। [२] ये प्राणापान (अतूर्तदक्षा) = अहिंसित बलवाले, (वृषणा) = शक्तिशाली व (वृषण्वसू) = सुखों के वर्षक धनवाले हैं। प्राणसाधना के द्वारा वह बल प्राप्त होता है, जो किन्हीं भी आन्तर शत्रुओं से हिंसित नहीं होता। ये हमें बलवान् बनाते हैं और उन सब वसुओं को प्राप्त कराते हैं, जो हमारे जीवन में सुखों का वर्षण करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-प्राणसाधना के होने पर ज्ञानी पुरुष मिलकर प्रभु का स्तवन करते हैं। ये प्राणापान अहिंसित बलवाले, शक्तिशाली व सुखवर्षक वसुओंवाले हैं।