सन्मार्गदर्शक 'मित्रावरुणौ'
पदार्थान्वयभाषाः - [१] ये मित्र और (वरुण) = स्नेह व निर्देषता के भाव (अक्ष्णः चित्) = आँखों से भी अधिक (गातुवित्तरा) = मार्ग को जाननेवाले हैं। स्नेह व निर्देषता ठीक ही मार्ग को दिखाते हैं। द्वेष में मनुष्य गलत सोचता है। [२] ये स्नेह व निर्देषता (अनुल्बणेन चक्षसा चित्) = न दुःसह तेजवाली सोम्य दृष्टि से ही अथवा (अनुरवण) = अदुःखद - वचनों से ही [चक्षु व्यक्तायां वाचि] (निमिषन्ता) = सब व्यवहारों को करते हैं। स्नेह व निर्देषता में कटुता का स्थान नहीं रहता। [३] ये स्नेह व निर्देषता (निचिरा) = नितरां चिरन्तन होते हुए, अर्थात् दीर्घायुष्यवाले होते हुए (निचिक्यतुः) = [पूजितौ बभूवतुः सा०] सत्कार के योग्य होते हैं। स्नेह व निर्देषता से दीर्घायुष्य प्राप्त होता है तथा जीवन सत्करणीय बनता है। लोग ऐसे जीवन को आदर की दृष्टि से देखते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- स्नेह व निर्देषता से [१] हमें जीवन का ठीक मार्ग दिखता है, [२] हमारे सब व्यवहार मधुर होते हैं, [३] दीर्घ सत्करणीय जीवन प्राप्त होता है।