वांछित मन्त्र चुनें

सं या दानू॑नि ये॒मथु॑र्दि॒व्याः पार्थि॑वी॒रिष॑: । नभ॑स्वती॒रा वां॑ चरन्तु वृ॒ष्टय॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

saṁ yā dānūni yemathur divyāḥ pārthivīr iṣaḥ | nabhasvatīr ā vāṁ carantu vṛṣṭayaḥ ||

पद पाठ

सम् । या । दानू॑नि । ये॒मथुः॑ । दि॒व्याः । पार्थि॑वीः । इषः॑ । नभ॑स्वतीः । आ । वा॒म् । च॒र॒न्तु॒ । वृ॒ष्टयः॑ ॥ ८.२५.६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:25» मन्त्र:6 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:22» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:6


0 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

उनके गुणों को दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मित्र और वरुण ! (या) जो आप दोनों (दानूनि+संयेमथुः) प्रजाओं को सुखी रखने के लिये बहुत से देव पदार्थों को संग्रह करके रखते हैं। यहाँ तक कि (दिव्याः) द्युलोकस्थ (पार्थिवीः) पार्थिव पृथिवीसम्बन्धी (इषः) धनों को इकट्ठा करते हैं। इस प्रकार (नभस्वतीः) आकाशस्थ (वृषथः) वृष्टियाँ भी (वाम्+आचरन्तु) आपकी सहायता करें ॥६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य के सुख के लिये जिन-२ वस्तुओं की आवश्यकता हो, वे सब ही संग्रहणीय हैं ॥६॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सब धन, दिव्य व पार्थिव प्रेरणायें, आनन्द की वृष्टि

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (या) = जो आप हे मित्र और वरुण ! (दानूनि) = सब देय धनों को (संयेमथुः) = हमारे लिये देते हो, उन (वाम्) = आपको (दिव्या:) = मस्तिष्करूप द्युलोक सम्बन्धी तथा (पार्थिवी:) = शरीररूप पृथिवी सम्बन्धी (इषः) = प्रेरणायें आचरन्तु प्राप्त हों। अर्थात् स्नेह व निर्देषता के होने पर हृदयस्थ के द्वारा मस्तिष्क व शरीर को ठीक बनाये रखने के लिये प्रेरणायें प्राप्त होती हैं। [२] इन प्रेरणाओं को प्राप्त करने पर और तदनुसार जीवन को बनाने पर (नभस्वतीः) = धर्ममेघ समाधि में मस्तिष्करूप आकाश से होनेवाली (वृष्टयः) = आनन्द की वर्षायें आचरन्तु हमें सर्वथा प्राप्त हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-स्नेह व निर्देषता से सब दैवी सम्पत्तियाँ प्राप्त होती हैं। मस्तिष्क व शरीर सम्बन्धी प्रेरणायें हृदयस्थ प्रभु से हमारे लिये दी जाती हैं। और अन्ततः धर्ममेघ समाधि में पहुँचकर हम आनन्द की वृष्टियों का अनुभव करते हैं।
0 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

तयोर्गुणान् दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मित्रावरुणौ ! या=यौ युवाम्। दानूनि=दानानि। संयेमथुः=संगृह्णीथः। दिव्याः=दिविस्थाः। पार्थिवीः=भौमाश्च। इषः=अन्नानि। सर्वाणि संचिनुथः। नभस्वतीः=आकाशस्थाः। वृषयोऽपि समये समये। वाम्=युवाम्। आचरन्तु ॥६॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - You hold, control, expand and direct the generous gifts of earthly and heavenly foods, energies and nourishments, so we pray that your showers laden with vapours from the sky may serve you, rain down and bless us.