अक्षिति माता से मित्रावरुणौ का जन्म
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ता) = उन मित्र और वरुण को (ऋतावरी) = ऋत का रक्षण करनेवाली (मही) = महनीय (अदितिः माता) = अदीना देवमाता, स्वास्थ्य की देवता [ अ+दिति = अखण्डन, स्वास्थ्य का न टूटना] (जजान) = उत्पन्न करती है। स्वस्थ मनुष्य ही स्नेह व निर्देषता के भावों का धारण करनेवाला होता है । अस्वास्थ्य मनुष्य को चिड़चिड़ा बना देता है। [२] ये मित्र और वरुण (विश्ववेदसा) = सम्पूर्ण आन्तर धनों को प्राप्त करानेवाले हैं और (प्रमहसा) = प्रकृष्ट तेजवाले हैं। स्नेह व निर्देषता के होने पर सब दिव्यगुण, सारी दैवी सम्पत्ति प्राप्त होती है और हम तेजस्विता का अपने में रक्षण करनेवाले होते हैं। अदिति माता इसलिए मित्रावरुणौ को जन्म देती है कि (असुर्याय) = आसुर भावों का विनाशक बल हमें प्राप्त हो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- स्वास्थ्य हमारे जीवनों में स्नेह व निर्देषता के भावों को जन्म देता है। इन स्नेह व निर्देषता के भावों से सम्पूर्ण दैवी सम्पत्ति प्राप्त होती है और प्रकृष्ट तेज प्राप्त होता है। ये मित्रावरुण सब आसुर भावों के विनाशक बल को प्राप्त कराते हैं।