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वचो॑ दी॒र्घप्र॑सद्म॒नीशे॒ वाज॑स्य॒ गोम॑तः । ईशे॒ हि पि॒त्वो॑ऽवि॒षस्य॑ दा॒वने॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vaco dīrghaprasadmanīśe vājasya gomataḥ | īśe hi pitvo viṣasya dāvane ||

पद पाठ

वचः॑ । दी॒र्घऽप्र॑सद्मनि । ईशे॑ । वाज॑स्य । गोऽम॑तः । ईशे॑ । हि । पि॒त्वः॑ । अ॒वि॒षस्य॑ । दा॒वने॑ ॥ ८.२५.२०

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:25» मन्त्र:20 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:24» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:20


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शिव शंकर शर्मा

पुनः उसी के गुण दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वन् ! जो ब्राह्मणप्रतिनिधि मित्र (दीर्घप्रसद्मनि) विस्तृत भवन में रहते हैं (यश्च) और जो (गोमतः+वाजस्य) गवादि पशुयुक्त सम्पत्तियों के ऊपर (ईष्टे) शासन करते हैं और (दावने) दान के लिये (अविषस्य) विषरहित प्रीतिकारी (पित्वः) अन्नों के ऊपर अधिकार रखते हैं, वे प्रशंसनीय हैं ॥२०॥
भावार्थभाषाः - जो सर्व प्रकार के धनों के स्वामी हों, वे ही ब्राह्मणपदवाच्य हैं ॥२०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु रूप महान् बन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (दीर्घप्रसद्मनि) इस महान् प्रकृष्ट भवनभूत, सब के शरण दाता प्रभु के विषय में (वचः) = स्तुति - वचनों का उच्चारण कर। ये प्रभु ही (गोमतः) = प्रशस्त इन्द्रियोंवाले व प्रशस्त ज्ञान की वाणियोंवाले बल को (ईशे) = ईश हैं। प्रभु ही प्रशस्त इन्द्रियों को, ज्ञान को व बल को देते हैं । [२] वे प्रभु (हि) = ही (अविषस्य) = सब प्रकार के विषैले प्रभावों से रहित (पित्वः) = अन्न के (दावने) = देने में (ईशे) = ईश हैं। प्रभु ही अमृततुल्य पोषक अन्नों को भी प्राप्त कराते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु ही महान् भवन हैं, सब की शरण हैं। ये प्रभु ही प्रशस्त इन्द्रियों को, ज्ञान व शक्ति को तथा निर्विघ्न अन्न को देने में समर्थ हैं।
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शिव शंकर शर्मा

पुनस्तस्यैव गुणान् दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वन् ! यो मित्रो ब्राह्मणप्रतिनिधिः। दीर्घप्रसद्मनि=विस्तृते भवने तिष्ठति। यश्च। गोमतः=गवादिपशुयुक्तस्य। वाजस्यान्नस्य। ईशे=ईष्टे। दावने=दानाय। अविषस्य=विषरहितस्य प्रीतिकारिणः। पित्वः=पितोरन्नस्य। ईशे+हि=ईष्टे एव ॥२०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Mitra, the Brahmana, rules the Word in the vast house of yajna, and the yajamana who is master of the wealth of lands and cows and prospers in food, energy and social achievement, as he also, rules over the food which is pure and poisonless and which is meant for gifting away.