पदार्थान्वयभाषाः - [१] (मित्रा) = स्नेह का भाव, जो (न) = जैसे (तना) = शक्तियों का विस्तार करनेवाला है, उसी प्रकार (रथ्या) = शरीररूप रथ को उत्तमता से ले चलनेवाला है। (यः च) = और जो (वरुणः) = निद्वेषता का भाव है, व (सुक्रतुः) = उत्तम प्रज्ञान व शक्तिवाला है। स्नेह से शक्ति वृद्धि होती है और शरीर रथ का उत्तम संचालन होता है। निर्देषता से ज्ञान व शक्ति का वर्धन होता है। [२] ये मित्र और वरुण (सनात्) = सदा से (सुजाता) = उत्तम विकासवाले हैं, (तनया) = शक्तियों का विस्तार करनेवाले हैं और (धृतव्रता) = व्रतों का धारण करनेवाले हैं। स्नेह व निर्देषता से उत्तम विकास-शक्तियों का विस्तार व पुण्य कर्मों का धारण होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-स्नेह यदि हमारी शक्तियों का विस्तार करता है और शरीर-रथ का उत्तम संचालन करता है, तो निर्देषता का भाव हमें सुक्रतु-उत्तम कर्मों व प्रज्ञानवाला बनाता है। ये स्नेह व निर्देषता के भाव उत्तम विकासवाले, शक्तियों का विस्तार करनेवाले व पुण्य कर्मों के धारक हैं।