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अनु॒ पूर्वा॑ण्यो॒क्या॑ साम्रा॒ज्यस्य॑ सश्चिम । मि॒त्रस्य॑ व्र॒ता वरु॑णस्य दीर्घ॒श्रुत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

anu pūrvāṇy okyā sāmrājyasya saścima | mitrasya vratā varuṇasya dīrghaśrut ||

पद पाठ

अनु॑ । पूर्वा॑णि । ओ॒क्या॑ । सा॒म्ऽरा॒ज्यस्य॑ । स॒श्चि॒म॒ । मि॒त्रस्य॑ । व्र॒ता । वरु॑णस्य । दी॒र्घ॒ऽश्रुत् ॥ ८.२५.१७

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:25» मन्त्र:17 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:24» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:17


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शिव शंकर शर्मा

राज्यनियम पालनीय हैं, यह इससे दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (दीर्घश्रुत्) बहुत दिनों से सुप्रसिद्ध (यद्वा) दूर-दूरों की बातों को सुननेवाले (मित्रस्य+वरुणस्य) ब्राह्मणप्रतिनिधि और राजप्रतिनिधि के किये हुए (साम्राज्यस्य) जो महाराज्य के (पूर्वाणि+ओक्या) अतिप्राचीन गृह्य नियम हैं और (व्रतानि) और उनके पालन के जो उपाय हैं, उनका (अनु+सश्चिम) हम लोग अनुसरण करें ॥१७॥
भावार्थभाषाः - राज्यप्रतिनिधियों से स्थापित जो नियम और उपाय हैं, उनका प्रतिपालन करना सबको उचित है ॥१७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मित्र और वरुण के व्रतों का पालन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] [साम्राज्यम् अस्य अस्मि] (साम्राज्यस्य) = इस सृष्टिरूप सत्य साम्राज्यवाले [इन्द्रः सत्यः सम्राट्] (मित्रस्य) = पापों से बचानेवाले [प्रमीतेः त्रायते] अथवा सब के प्रति स्नेह करनेवाले प्रभु के (पूर्वाणि) = पालन व पूरण करनेवाले अथवा पूर्णता को लिये हुए (ओक्या) = गृह हितकारी नियमों को (अनु सश्चिम) = पालित करें। प्रभु से निर्दिष्ट नियमों के अनुसार ही घरों में वर्ते । नियमानुकूल वर्तन ही गृहों का कल्याण करेगा। [२] (दीर्घश्रुत्) = [दीर्घश्रुतः] उस दीर्घदर्शी सर्वज्ञ (वरुण) = पापों व द्वेषों से निवारित करनेवाले प्रभु के (व्रता) = कर्मों का हम अनुकरण करें । वरुण के व्रतों का पालन करते हुए हम कभी बन्धन में न पड़ेंगे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम उस सब के मित्र सम्राट् के गृह हितकारी नियमों का पालन करते हुए घरों को उत्तम बनायें। उस सर्वज्ञ वरुण के व्रतों का पालन करते हुए सब बन्धनों से ऊपर उठें।
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शिव शंकर शर्मा

राज्यनियमाः पालनीया इति दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः - साम्राज्यस्य=राष्ट्रस्य। पूर्वाणि=पुरातनानि। ओक्या=गृह्याणि। ओको गृहम्। दीर्घश्रुत्=दीर्घश्रुतः। मित्रस्य वरुणस्य च। व्रतानि। अनुसश्चिम=अनुसरामः ॥१७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - We observe and follow the rules and laws of the discipline of Mitra and Varuna, lord of universal glory, in accordance with the internal statutes and ancient traditions of the sovereign social order.