अपरीतं शवः, अमृक्ता रातिः
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे इन्द्र-शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभो! हे (नृतो) = सम्पूर्ण संसार को नृत्य करानेवाले प्रभो ! (यथा) = जैसे (ते शवः) = आपका बल (हि) = निश्चय से (अपरीतं अस्ति) = शत्रुओं से अपरिगत, अव्याप्त होता है, अर्थात् कोई भी आप के बल को अभिभूत नहीं कर पाता। उसी प्रकार (पुरुहूत) = बहुतों से पुकारे जानेवाले प्रभो ! (दाशुषे) = दाश्वान् पुरुष के लिये, दानशील पुरुष के लिये (रातिः) = आपका दान (अमृक्ता) = अहिंसित है। अर्थात् दानशील के लिये आपका दान सदा प्रवृत्त रहता ही है । [२] प्रभु अपने उपासक के लिये उस शक्ति को प्राप्त कराते हैं जो किसी भी शत्रु से अभिभूत नहीं होती, तथा प्रभु इस उपासक के लिये उस धन के दान को करते हैं, जो सदा होता ही रहता है। यह धन का दान कभी समाप्त नहीं होता।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उस सर्वशक्तिमान् प्रभु का बल शत्रुओं से अभिभूत नहीं होता। उस प्रभु का धन का दान दाश्वान् पुरुष के लिये सदा होता ही है।