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इन्द्र॒ यथा॒ ह्यस्ति॒ तेऽप॑रीतं नृतो॒ शव॑: । अमृ॑क्ता रा॒तिः पु॑रुहूत दा॒शुषे॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indra yathā hy asti te parītaṁ nṛto śavaḥ | amṛktā rātiḥ puruhūta dāśuṣe ||

पद पाठ

इन्द्र॑ । यथा॑ । हि । अस्ति॑ । ते॒ । अप॑रिऽइतम् । नृ॒तो॒ इति॑ । शवः॑ । अमृ॑क्ता । रा॒तिः । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । दा॒शुषे॑ ॥ ८.२४.९

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:24» मन्त्र:9 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:16» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:9


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शिव शंकर शर्मा

उसका दान दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (नृतो) हे जगन्नर्तक ! (पुरुहूत) बहुसम्पूजित (यथा) जैसे (ते+शवः) तेरी शक्ति (अपरीतम्+हि+अस्ति) अविनाशित अविध्वंसनीय है, वैसा ही (दाशुषे) भक्तजनों के प्रति (रातिः) तेरा दान भी (अमृक्ता) अहिंसित और अनिवारणीय है ॥९॥
भावार्थभाषाः - उसका बल और दान दोनों अविनश्वर हैं ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अपरीतं शवः, अमृक्ता रातिः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे इन्द्र-शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभो! हे (नृतो) = सम्पूर्ण संसार को नृत्य करानेवाले प्रभो ! (यथा) = जैसे (ते शवः) = आपका बल (हि) = निश्चय से (अपरीतं अस्ति) = शत्रुओं से अपरिगत, अव्याप्त होता है, अर्थात् कोई भी आप के बल को अभिभूत नहीं कर पाता। उसी प्रकार (पुरुहूत) = बहुतों से पुकारे जानेवाले प्रभो ! (दाशुषे) = दाश्वान् पुरुष के लिये, दानशील पुरुष के लिये (रातिः) = आपका दान (अमृक्ता) = अहिंसित है। अर्थात् दानशील के लिये आपका दान सदा प्रवृत्त रहता ही है । [२] प्रभु अपने उपासक के लिये उस शक्ति को प्राप्त कराते हैं जो किसी भी शत्रु से अभिभूत नहीं होती, तथा प्रभु इस उपासक के लिये उस धन के दान को करते हैं, जो सदा होता ही रहता है। यह धन का दान कभी समाप्त नहीं होता।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उस सर्वशक्तिमान् प्रभु का बल शत्रुओं से अभिभूत नहीं होता। उस प्रभु का धन का दान दाश्वान् पुरुष के लिये सदा होता ही है।
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शिव शंकर शर्मा

तस्य दानं दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः - हे नृतो=जगन्नर्तक ! हे पुरुहूत=पुरुभिः संपूजित ! यथा। ते=तव। शवः=शक्तिः=सामर्थ्यम्। अपरीतम्+हि+अस्ति। अविनाशितमस्ति। तथा। दाशुषे=भक्तजनं प्रति। तव। रातिर्दानमपि। अमृक्ता=अहिंसिता ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord and leader of humanity, just as your power and force is irresistible and indestructible, O lord universally invoked and adored, so is your charity and magnanimity to the generous devotee unrestricted and inviolable.