'अनूर्मि वाजी- यम' प्रभु का स्तवन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (व्यश्ववत्) = व्यश्व की तरह उत्तम इन्द्रियाश्वोंवाले पुरुष की तरह तू (इन्द्रम्) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु का स्तुहि स्तवन कर, जो (अनूर्मिम्) = [ऊर्मि] शोक-मोह, जरा-मृत्यु व क्षुत् पिपासा रूप ऊर्मियों से रहित हैं 'शोकमोहौ जरामृत्यू क्षुत् पिपासे षडूर्मयः'। उस प्रभु में शोक- मोह आदि किसी भी दुर्बलता का निवास नहीं। (वाजिनम्) = जो प्रभु शक्तिशाली हैं और (यमम्) = सर्वनियन्ता हैं। इस प्रभु का स्तवन करता हुआ स्तोता भी दुर्बलताओं से ऊपर उठने का प्रयत्न करता है, शक्तिशाली बनता है और अपना संयम करनेवाला होता है। [२] उस प्रभु का हम स्तवन करें जो (दाशुषे) = दाश्वान् पुरुष के लिये, प्रभु के प्रति अपना अर्पण करनेवाले पुरुष के लिये (अर्य:) = काम-क्रोध-लोभरूप शत्रुओं के (गयम्) = गृह को (विमंहमानम्) = विशेषरूप से प्राप्त कराता है। काम ने आज तक इन्द्रियों में अपना निवास बनाया हुआ था, क्रोध ने मन को अपनाया हुआ था और लोभ ने बुद्धि पर अधिकार किया हुआ था। प्रभु इन सब को दूर करके यह शरीर गृह दाश्वान् को प्राप्त कराते हैं। उपासक के जीवन में काम-क्रोध-लोभ का निवास नहीं रहता ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु-स्तवन से हम शोक-मोह आदि से ऊपर उठते हैं, शक्तिशाली व संयमी बनते हैं। हमारा शरीर काम-क्रोध-लोभ का घर नहीं बना रहता । =