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अगो॑रुधाय ग॒विषे॑ द्यु॒क्षाय॒ दस्म्यं॒ वच॑: । घृ॒तात्स्वादी॑यो॒ मधु॑नश्च वोचत ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agorudhāya gaviṣe dyukṣāya dasmyaṁ vacaḥ | ghṛtāt svādīyo madhunaś ca vocata ||

पद पाठ

अगो॑ऽरुधाय । गो॒ऽइषे॑ । द्यु॒क्षाय॑ । दस्म्य॑म् । वचः॑ । घृ॒तात् । स्वादी॑यः । मधु॑नः । च॒ । वो॒च॒त॒ ॥ ८.२४.२०

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:24» मन्त्र:20 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:18» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:20


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शिव शंकर शर्मा

पुनः वही विषय आ रहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यों ! (वचः+वोचत) उस परमात्मा की कीर्तिगान उन वचनों से करो, जो (घृतात्) घृत से भी (मधुनः+च) मधु से भी (स्वादीयः) अधिक स्वादिष्ट हों और (दस्म्यम्) श्राव्य और दृश्य हों, जो इन्द्र (अगोरुधाय) स्तुतियों का श्रोता (गविषे) स्तुतियों का इच्छुक (द्युक्षाय) और सर्वत्र दीप्यमान है ॥२०॥
भावार्थभाषाः - उत्तमोत्तम स्तोत्र रचकर उसकी स्तुतियों का जाप करे ॥२०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'घृत व मधु' से भी अधिक मधुर वचन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अगोरुधाय) = [गाः न रुणद्धि] ज्ञान की वाणियों को न रोकनेवाले, निरन्तर ज्ञान की वाणियों को प्राप्त करानेवाले, गविषे हमारे लिये [गावः इन्द्रियाणि] उत्तम इन्द्रियों को प्रेरित करनेवाले और इस प्रकार (द्युक्षाय) = प्रकाश में निवास करानेवाले प्रभु के लिये, ऐसे प्रभु की प्राप्ति के लिये (दस्म्यम्) = दुःख का नाश करनेवालों में उत्तम (वचः) = वचन को (वोचत) = बोलो। दुःखियों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दुःखनिवारक वचनों को बोलनेवाला ही उस प्रभु को प्राप्त करता है जो निरन्तर ज्ञान की वाणियों व उत्तम इन्द्रियों को प्राप्त कराके हमें प्रकाश में निवासवाला बनाते हैं। [२] हे मनुष्यो ! प्रभु की प्राप्ति के लिये (घृतात् स्वादीयः) = घृत से भी अधिक स्वादिष्ट (च) = तथा (मधुनः) = शहद से भी अधिक मधुर वचन [बोचत=] बोलो। कटुवचन दूसरे के हृदय को काटते हुए अन्त:स्थित प्रभु के भी निरादर का कारण बनते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु प्राप्ति के लिये 'दुःखनाशक, घृत से भी स्वादिष्ट और शहद से भी अधिक मधुर' वचनों को बोलें। ये प्रभु ज्ञान की वाणियों व उत्तम इन्द्रियों को प्राप्त कराके हमारे लिये प्रकाश को प्राप्त कराते हैं।
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शिव शंकर शर्मा

पुनस्तदनुवर्तते।

पदार्थान्वयभाषाः - अगोरुधाय=गाः स्तुती रुणद्धीति गोरुधः। न गोरुधोऽगोरुधः तस्मै। स्तुतिश्रोत्रे इत्यर्थः। गविषे=गाः स्तोत्राणि इच्छते। द्युक्षाय=दीप्यमानायेन्द्राय। दस्म्यम्=दर्शनीयम्। घृतादपि स्वादीयः। मधुनश्च स्वादीयः। वचः। वोचत=ब्रूत ॥२०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Sing delightful songs of adoration in words more delicious than the taste of ghrta and sweetness of honey in honour of Indra, heavenly lord of light, who loves sweet speech and never feels satiated with songs of exaltation.