'घृत व मधु' से भी अधिक मधुर वचन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अगोरुधाय) = [गाः न रुणद्धि] ज्ञान की वाणियों को न रोकनेवाले, निरन्तर ज्ञान की वाणियों को प्राप्त करानेवाले, गविषे हमारे लिये [गावः इन्द्रियाणि] उत्तम इन्द्रियों को प्रेरित करनेवाले और इस प्रकार (द्युक्षाय) = प्रकाश में निवास करानेवाले प्रभु के लिये, ऐसे प्रभु की प्राप्ति के लिये (दस्म्यम्) = दुःख का नाश करनेवालों में उत्तम (वचः) = वचन को (वोचत) = बोलो। दुःखियों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दुःखनिवारक वचनों को बोलनेवाला ही उस प्रभु को प्राप्त करता है जो निरन्तर ज्ञान की वाणियों व उत्तम इन्द्रियों को प्राप्त कराके हमें प्रकाश में निवासवाला बनाते हैं। [२] हे मनुष्यो ! प्रभु की प्राप्ति के लिये (घृतात् स्वादीयः) = घृत से भी अधिक स्वादिष्ट (च) = तथा (मधुनः) = शहद से भी अधिक मधुर वचन [बोचत=] बोलो। कटुवचन दूसरे के हृदय को काटते हुए अन्त:स्थित प्रभु के भी निरादर का कारण बनते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु प्राप्ति के लिये 'दुःखनाशक, घृत से भी स्वादिष्ट और शहद से भी अधिक मधुर' वचनों को बोलें। ये प्रभु ज्ञान की वाणियों व उत्तम इन्द्रियों को प्राप्त कराके हमारे लिये प्रकाश को प्राप्त कराते हैं।