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एदु॒ मध्वो॑ म॒दिन्त॑रं सि॒ञ्च वा॑ध्वर्यो॒ अन्ध॑सः । ए॒वा हि वी॒रः स्तव॑ते स॒दावृ॑धः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ed u madhvo madintaraṁ siñca vādhvaryo andhasaḥ | evā hi vīraḥ stavate sadāvṛdhaḥ ||

पद पाठ

आ । इत् । ऊँ॒ इति॑ । मध्वः॑ । म॒दिन्ऽत॑रम् । सि॒ञ्च । वा॒ । अ॒ध्व॒र्यो॒ इति॑ । अन्ध॑सः । ए॒व । हि । वी॒रः । स्तव॑ते । स॒दाऽवृ॑धः ॥ ८.२४.१६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:24» मन्त्र:16 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:18» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:16


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शिव शंकर शर्मा

वही पूज्यतम है, यह दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (अध्वर्यो) हे याज्ञिक पुरुष ! (मध्वः) मधुर (सदावृधः) सदा बलवीर्य्यवर्धक (अन्धसः) अन्नों में से (मदिन्तरम्) आनन्दप्रद कुछ हिस्से लेकर (आ+सिञ्च+इत्) ईश्वर की प्रीति के लिये पात्रों में दो (हि) क्योंकि यही इन्द्र (एव) निश्चय (वीरः) सब विघ्नों को दूर करनेवाला (स्तवते) स्तुतियोग्य है ॥१६॥
भावार्थभाषाः - जो तुम शुभ काम करो, वह ईश्वर की प्रीति के लिये ही हो ॥१६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

कर्मठ ही सच्चा उपासक है

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अध्वर्यो) = यज्ञशील पुरुष ! तू (इत् वा उ) = निश्चय से (मध्वः अन्धसः) = माधुर्य का संचार करनेवाले सोम [वीर्य] से भी (मदिन्तरम्) = अधिक आनन्दित करनेवाले उस प्रभु को (आसिञ्च) = अपने में सिक्त कर । प्रभु की उपासना का भाव तेरी नस-नस में व्याप्त हो जाये। [२] वह (वीरः) = शत्रुओं को विशेषरूप से कम्पित करके दूर करनेवाला, (सदावृधः) = सदा वृद्धि को प्राप्त हुआ हुआ प्रभु (एवा हि) = गतिशीलता के द्वारा ही (स्तवते) = स्तुति किया जाता है। अर्थात् क्रियाशील पुरुष ही प्रभु का सच्चा उपासक है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- शरीर में सुरक्षित सोम उल्लास का कारण होता है। प्रभु का हृदय में धारण उससे भी अधिक आनन्दित करनेवाला होता है। उस 'वीर सदावृध्' प्रभु का सच्चा उपासक वही है जो क्रियाशील है।
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शिव शंकर शर्मा

स एव पूज्यतम इति दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अध्वर्यो ! मध्वः=मधुरस्य। सदावृधः=सदावर्धकस्य। अन्धसः=अन्नस्य। मदिन्तरम्=आनन्दयितृतरम्। भागमासिञ्च। इत्=ईश्वरप्रीत्यर्थम्। पात्रेषु निक्षिपैव। हि=यतः। अयमेवेन्द्रः। वीरः=विघ्नानां दूरप्रेरयिता दाता च पुनः। स्तवते=स्तूयते च ॥१६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And O high priest of the creative yajna of love and non-violence, offer the most delightful and ever exhilarating of honey sweets of the soma of faith and devotion to Indra, since thus is how the mighty hero is served and worshipped.