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नू अ॒न्यत्रा॑ चिदद्रिव॒स्त्वन्नो॑ जग्मुरा॒शस॑: । मघ॑वञ्छ॒ग्धि तव॒ तन्न॑ ऊ॒तिभि॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

nū anyatrā cid adrivas tvan no jagmur āśasaḥ | maghavañ chagdhi tava tan na ūtibhiḥ ||

पद पाठ

नु । अ॒न्यत्र॑ । चि॒त् । अ॒द्रि॒ऽवः॒ । त्वत् । नः॑ । ज॒ग्मुः॒ । आ॒ऽशसः॑ । मघ॑ऽवन् । श॒ग्धि । तव॑ । तत् । नः॒ । ऊ॒तिऽभिः॑ ॥ ८.२४.११

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:24» मन्त्र:11 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:17» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:11


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शिव शंकर शर्मा

वही स्तुत्य है यह दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (अद्रिवः) हे संसारधारक (मघवन्) हे सर्वधनसम्पन्न ! (नः+आशसः) हमारे स्तोत्र और अभिलाष (त्वत्+अन्यत्र+चित्) तुझको छोड़कर अन्य किन्हीं देवों में (नू+जग्मुः) कदापि न गये न जाते हैं (तत्) इसलिये (तव+ऊतिभिः) तू अपनी रक्षा और सहायता से (नः+शग्धि) हमको सब प्रकार सामर्थ्ययुक्त कर ॥११॥
भावार्थभाषाः - वही हमको सर्व कार्य में समर्थ कर सकता है, यदि मन से उसकी स्तुति करें ॥११॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु से ही याचना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अद्रिवः) = आदरणीय प्रभो ! (नः आशसः) = हमारी कामनायें, आशंसन, अभिलाषायें (त्वत्) = आप से (अन्यत्र) = और जगह (नू चित्) = नहीं ही (जग्मुः) = जायें। अर्थात् हम अपनी सब अभिलाषायें आप के सामने ही प्रकट करें। [२] हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् प्रभो ! आप (नः) = हमारे लिये (ऊतिभिः) = रक्षणों के साथ (तव) = आपके (तत्) = उस ऐश्वर्य को (शग्धि) = दीजिये [देहि] ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु से ही याचना करें। प्रभु रक्षणों के साथ हमें सब ऐश्वर्यों को प्राप्त करायेंगे।
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शिव शंकर शर्मा

स एव स्तुत्य इति दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अद्रिवः=हे संसारधारक ! हे मघवन् ! नः=अस्माकम्। आशसः=आशंसनानि=स्तोत्राणि। अभिलाषा वा। त्वत्=त्वत्तः। अन्यत्र+चित्=अन्येषु देवेषु। नू=नहि कदापि। जग्मुः=गच्छन्ति। तत्तस्मात्। तव। ऊतिभिः=रक्षाभिः। नोऽस्मान्। शग्धि=शक्तान् कुरु ॥११॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O lord of glory, wielder of the thunderbolt of justice and retribution, our hopes and prayers have never wandered elsewhere, to anyone other than you. Pray strengthen our will and action with your modes of protection and promotion for advancement.