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हर्य॑श्वं॒ सत्प॑तिं चर्षणी॒सहं॒ स हि ष्मा॒ यो अम॑न्दत । आ तु न॒: स व॑यति॒ गव्य॒मश्व्यं॑ स्तो॒तृभ्यो॑ म॒घवा॑ श॒तम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

haryaśvaṁ satpatiṁ carṣaṇīsahaṁ sa hi ṣmā yo amandata | ā tu naḥ sa vayati gavyam aśvyaṁ stotṛbhyo maghavā śatam ||

पद पाठ

हरि॑ऽअश्वम् । सत्ऽप॑तिम् । च॒र्ष॒णि॒ऽसह॑म् । सः । हि । स्म॒ । यः । अम॑न्दत । आ । तु । नः॒ । सः । व॒य॒ति॒ । गव्य॑म् । अश्व्य॑म् । स्तो॒तृऽभ्यः॑ । म॒घऽवा॑ । श॒तम् ॥ ८.२१.१०

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:21» मन्त्र:10 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:2» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:10


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शिव शंकर शर्मा

उसके गुण कीर्तनीय हैं, वह इससे दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (सः+हि+स्म) वही मनुष्य परमात्मा की उपासना करता है (यः+अमन्दत) जो इस जगत् में कलत्र पुत्रादि के साथ सर्वसुख अनुभव करता है। कैसा वह परमात्मा है−(हर्य्यश्वम्) यह संसार ही जिसका घोड़ा है, (सत्पतिम्) सत्पति (चर्षणीसहम्) दुष्टजन का शासक है। इसलिये (सः+मघवा) परमधनसम्पन्न वह इन्द्र (शतम्) विविध अनेक (गव्यम्) गोयुक्त (अश्व्यम्) अश्वयुक्त धन (नः+स्तोतृभ्यः) हम स्तुतिपाठक जनों को जल्दी (आवयति) देवे ॥१०॥
भावार्थभाषाः - वही परमदेव हम जीवों का मनोरथ पूर्ण कर सकता है ॥१०॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (हर्यश्वम्) शीघ्र हरण करनेवाले अश्ववाला (सत्पतिम्) सज्जनों का पालक (चर्षणीसहम्) अपने प्रतिपक्षियों को दुःख सहानेवाले उस शूर को (स, हि, स्म) वही मनुष्य प्राप्त कर सकता है, (यः) जो (अमन्दत) धनादि से हर्षपूर्ण हो (सः, मघवा) वह धनवान् सेनापति (स्तोतृभ्यः, नः) स्तुति करनेवाले हम लोगों को (तु) शीघ्र (शतम्) अनेक प्रकार की (गव्यम्, अश्व्यम्) गवाश्वादि पदार्थों से संकुल समृद्धि को (वयति) प्राप्त कराये ॥१०॥
भावार्थभाषाः - भाव यह है कि अनेक प्रकार की सम्पत्ति की प्राप्ति करानेवाले उस सेनापति की रक्षा से सुरक्षित होकर समृद्धिशाली प्रजाजन ही उसका आह्वान तथा यजन करते हैं, इसलिये सब प्रजाओं को समृद्ध होने के लिये उसकी प्रार्थना करनी चाहिये ॥१०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सच्चा स्तोता = सदा प्रसन्न

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (हर्यश्वम्) = सब अज्ञानों व पापों का हरण करनेवाले [हरि] इन्द्रियाश्वों को प्राप्त करानेवाले, (सत्पतिम्) = श्रेष्ठ कर्मों के रक्षक, (चर्षणीसहम्) = शत्रुभूत मनुष्यों का पराभव करनेवाले प्रभु को (सः) = वह (हि) = ही [स्तुषे] (स्म) = स्तुत करता है ['स्तुषे' क्रिया गत मन्त्र से अनुवृत्त है ] (यः) = जो (अमन्दत) = सदा प्रसन्न रहता है। प्रभु जिस भी स्थिति में रखें, उसी स्थिति में प्रसन्न रहना ही प्रभु का सच्चा स्तोता बनना है। [२] (सः मधवा) = वे परमैश्वर्यशाली प्रभु ही (तु) = तो (नः स्तोतृभ्यः) = हम स्तोताओं के लिये शतम् शतवर्षपर्यन्त सुचारुरूपेण कार्य करनेवाले (गव्यम्) = ज्ञानेन्द्रिय समूह को तथा (अश्वथम्) = कर्मेन्द्रिय समूह को (आवयति) = [ प्रापयति] प्राप्त कराते हैं। इन इन्द्रियों के द्वारा हमारा जीवन बड़ा सुन्दर बना रहता है, इन्हीं की ठीक स्थिति व क्रिया पर सम्पूर्ण सुख निर्भर है [सु+ख]।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-‘हम सदा प्रसन्न रहें । यही वस्तुतः प्रभु का सच्चा स्तवन है। प्रभु हमारे लिये सौ वर्ष तक चलनेवाले इन्द्रियाश्वों को प्राप्त कराते हैं।
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शिव शंकर शर्मा

तदीयगुणाः कीर्तनीया इति दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः - स हि स्म=स एव जनः। तमीशं पूजयति। योऽमन्दत=जगति सर्वसुखमनुभवति। कीदृशम्। हर्य्यश्वम्=संसाराश्वम्। सत्पतिम्। चर्षणीसहम्= दुष्टजनानामभिभवितारम्। अतः। मघवा=परमधनसम्पन्नः। स इन्द्रः। शतम्। गव्यम्=गोयुतम्। अश्व्यम्=अश्वसहितम्। धनम्। नोऽस्मभ्यम्। स्तोतृभ्यः। तु=क्षिप्रम्। आवयति=आप्रापयतु ॥१०॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (हर्यश्वम्) शीघ्रहारकाश्वम् (सत्पतिम्) सतां पालकम् (चर्षणीसहम्) प्रतिपक्षिजनस्याभिभवितारम् तं शूरम् (स, हि, स्म) स हि जनः लभते (यः, अमन्दत) यो धनादिना हर्षपूर्णो भवति (सः, मघवा) स धनवान् (स्तोतृभ्यः) स्वानुगामिभ्यः (तु) क्षिप्रम् (नः) अस्मभ्यम् (शतम्) अनेकविधम् (गव्यम्, अश्व्यम्) गवाश्वादिसंकुलां समृद्धिम् (वयति) प्रापयतु ॥१०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - He alone is happy indeed and prospers who glorifies Indra, lord of the moving universe, protector and promoter of truth and reality and ruler and justicier of humanity, who, lord almighty, weaves for us this web of a hundredfold variety of earthly provision and all attainable possibility for the celebrants.