पदार्थान्वयभाषाः - [१] शरीर में सोम का सम्पादन व रक्षण करना होता है। सोम का सम्पादन ही 'सवन' है। ये सवन तीन हैं- 'प्रातः सवन, माध्यन्दिन सवन, तृतीय सवन'। जीवन के प्रथम चौबीस वर्ष प्रातः सवन हैं, अगले चवालीस वर्ष माध्यन्दिन सवन, अन्तिम अड़तालीस वर्ष तृतीय सवन हैं। इन तीनों सवनों में सम्पादित होने से सोम भी तीन हैं। ये (त्र्यः सुतासः सोमाः) = तीनों सवनों में उत्पन्न किये गये सोम (देवस्य) = दिव्यगुणों का अपने में वर्धन करनेवाले इन्द्रस्य जितेन्द्रिय पुरुष के (सन्तु) = हों । इन्द्रदेव तीनों सवनों में सोम का पान करनेवाला हो। ये सोम ही तो उसे 'इन्द्रदेव' बनाते हैं। [२] ये तीनों सोम उन इन्द्रदेव के हों, जो (स्वे क्षये) = अपने इस शरीररूप गृह में (सुतपान:) = उत्पन्न सोमों का पान करते हैं। शरीर में ही सोम का रक्षण सोम का पान है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम जीवन के प्रातः, मध्याह्न व सायं में (बाल्य, यौवन व वार्धक्य में) सोम का रक्षण करनेवाले बनें। यह सोम का पान हमें दिव्यगुण सम्पन्न व ऐश्वर्यशाली बनायेगा ।