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न घे॑म॒न्यदा प॑पन॒ वज्रि॑न्न॒पसो॒ नवि॑ष्टौ । तवेदु॒ स्तोमं॑ चिकेत ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

na ghem anyad ā papana vajrinn apaso naviṣṭau | taved u stomaṁ ciketa ||

पद पाठ

न । घ॒ । ई॒म् । अ॒न्यत् । आ । प॒प॒न॒ । वज्रि॑न् । अ॒पसः॑ । नवि॑ष्टौ । तव॑ । इत् । ऊँ॒ इति॑ । स्तोम॑म् । चि॒के॒त॒ ॥ ८.२.१७

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:2» मन्त्र:17 | अष्टक:5» अध्याय:7» वर्ग:20» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:1» मन्त्र:17


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शिव शंकर शर्मा

वही स्तवनीय है, अन्य नहीं, यह इससे दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (वज्रिन्) हे सर्वज्ञ महादण्डधारी परमदेव ! (नविष्टौ) हमारे नव-२ शुभकर्म उपस्थित होने पर (अपसः) सर्वव्यापी और कर्मपरायण आपके (अन्यत्) अतिरिक्त स्तोत्र का गान (न+घ+ईम्) मैं कदापि नहीं (आपपन) करता हूँ। किन्तु (तव+इद्+उ) तेरे ही (स्तोमम्) स्तुति का गान (चिकेत) जानता हूँ ॥१७॥
भावार्थभाषाः - इससे यह सिद्ध होता है कि प्रत्येक शुभकर्म में केवल भगवान् ही स्तवनीय है और अन्यान्य देवों की उपासना से हानि ही है ॥१७॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वज्रिन्) हे वज्रशक्तिशालिन् ! (अपसः, नविष्टौ) कर्मों के नूतन यज्ञ में (अन्यत्) अन्य की (आपपन, न घ, ईं) स्तुति नहीं ही करता हूँ (तव, इत्, उ) आप ही के (स्तोमं) स्तोत्र को (चिकेत) जानता हूँ ॥१७॥
भावार्थभाषाः - जिज्ञासु की ओर से यह स्तुति की गई है कि हे बड़ी शक्तिवाले कर्मयोगिन् ! नवीन रचनात्मक कर्मरूपी यज्ञ में मैं आप ही की स्तुति करता हूँ। कृपा करके मुझको आप अपने सदुपदेशों से कर्मण्य बनावें, ताकि मैं भी कर्मशील होकर ऐश्वर्य्य प्राप्त करूँ ॥१७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु का ही स्तवन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (वज्रिन्) = क्रियाशीलता रूप वज्र [ वज् गतौ] वाले प्रभो ! मैं (अपसः नविष्टौ) = कर्मों के अभिनव याग में, अर्थात् प्रत्येक कर्मयज्ञ के अवसर पर (वा ईम्) = निश्चय से अन्यत् (न आपपन) = किसी और का स्तवन न करूँ। [२] (तव इत् उ) = निश्चय से आपके ही (स्तोमं चिकेत) = स्तवन को जानूँ। अर्थात् आपका ही स्तवन करूँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रत्येक कार्य के अवसर पर प्रभु का स्तवन करें। प्रभु का स्तवन ही हमें शक्ति देगा और हम कार्य को सफलता के साथ कर सकेंगे।
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शिव शंकर शर्मा

स एव स्तुत्यो नान्य इत्यनया दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः - हे वज्रिन्=सर्वज्ञानमय महादण्डधारिन् परमदेव ! नविष्टौ=नवे नवे उत्सवादौ शुभकर्मणि उपस्थिते सति। अपसः=सर्वव्यापिनस्तव। अन्यत्=त्वद्विषयाद् अन्यत् स्तोत्रम्। न+घ+ईं=न कदापि। आपपन=अभिष्टौमि। पनतेः स्तुतिकर्मण उत्तमे णलि लिटि रूपम्। अपितु। तवेदु=तवैव। स्तोमम्=स्तुतिम्। चिकेत=जानामि। तवैव गुणप्रकाशं करोमीत्यर्थः ॥१७॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वज्रिन्) हे वज्रशक्तिक ! (अपसः, नविष्टौ) कर्मसम्बन्धियज्ञे नवे (न, घ, ईं) नैव (अन्यत्) अन्यं (आपपन) स्तौमि (तव, इत्, उ) तवैव (स्तोमं) स्तोत्रं (चिकेत) जानामि ॥१७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of thunder and justice, in the beginning of a new plan, action or programme of holiness, I adore none else but only you. I know only one song of adoration and that is for you alone.