इ॒मे त॑ इन्द्र॒ सोमा॑स्ती॒व्रा अ॒स्मे सु॒तास॑: । शु॒क्रा आ॒शिरं॑ याचन्ते ॥
ime ta indra somās tīvrā asme sutāsaḥ | śukrā āśiraṁ yācante ||
इ॒मे । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । सोमाः॑ । ती॒व्राः । अ॒स्मे इति॑ । सु॒तासः॑ । शु॒क्राः । आ॒ऽशिर॑म् । या॒च॒न्ते॒ ॥ ८.२.१०
शिव शंकर शर्मा
सर्व पदार्थ का ईशाधीनत्व इससे दिखलाते हैं।
आर्यमुनि
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
[१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यवन् प्रभो ! (इमे) = ये (ते) = आपके (सोमाः) = सोमकण (तीव्राः) = बड़े तीव्र हैं, शत्रुओं के लिये भयंकर हैं। (अस्मे) = हमारे लिये (सुतासः) = ये उत्पन्न किये गये हैं। [२] (शुक्राः) = [शुक गतौ] गतिशील पुरुष (आशिरम्) = [आशृणाति ] समन्तात् शत्रुओं को शीर्ण करनेवाले इस सोम को (याचन्ते) = माँगते हैं। गतिशीलता के द्वारा ही सोम का रक्षण होता है। सुरक्षित सोम शरीर में रोग व वासनारूप शत्रुओं के विनाश का कारण बनता है।
शिव शंकर शर्मा
सर्वस्येशस्य निघ्नत्वं दर्शयति।
