पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु कहते हैं कि हे स्तोतः ! तू (नः) = हमारे इन (विश्वा रूपाणि) = सब रूपों में (आविशन्) = प्रवेश करता हुआ, अर्थात् सब प्राणियों के जीवन के साथ अपने जीवन को मिलाता हुआ (महे क्षयाय) = महान् निवास व गति के लिये (अरम्) = समर्थ हो। सब के साथ अपने को एक करता हुआ अपने जीवन को सुन्दर बना । [२] उन (शचीपतिम्) = सब शक्तियों व प्रज्ञानों के स्वामी (इन्द्रम्) = परमैश्वर्यशाली प्रभु को (जैत्राय) = विजय के लिये (हर्षया) = हर्षित कर। अपने कर्मों से हम प्रभु को प्रीणित करनेवाले बनें। प्रभु हमें विजयी बनायेंगे। सर्वमहान् कर्म यही है कि हम सब प्राणियों के साथ एक होने का प्रयत्न करें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सब प्राणियों के साथ अपने को एक करते हुए हम उत्तम निवासवाले बनें। शक्ति व प्रज्ञानों के स्वामी प्रभु को अपने कर्मों से प्रसन्न करते हुए सदा विजयी बनें। यह सब प्राणियों के साथ अपने को एक करनेवाला व्यक्ति भौतिक सुखों से ऊपर उठकर पवित्र हृदय बनने का प्रयत्न करता है। सो 'इरिम्बिठि' कहलाता है, 'बिठ' अन्तरिक्ष की ओर 'इर' गति करनेवाला । भूलोक से ऊपर उठकर यह अन्तरिक्षलोक में गतिवाला होता है। भौतिक भोगों में न फँसना ही समझदारी है, एवं यह ' काण्व' है। यह 'इरम्बिठि काण्व' कहता है कि-