पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभो! आप हमारे जीवनों में (असुन्वाम्) = अपने अन्दर सोम का अभिषव न करनेवाली, सोम का रक्षण न करनेवाली (संसदम्) = आसुरभावों की सभा को (विषूचीम्) = विविध विरुद्ध दिशाओं में गतिवाली को (व्यनाशयः) = विनष्ट करते हैं। प्रभु की उपासना से आसुरी वृत्तियाँ विनष्ट हो जाती हैं। ये आसुरी वृत्तियाँ शरीर में सोम-रक्षण के अनुकूल नहीं होती। [२] इन आसुरी वृत्तियों के विनाश के द्वारा वे प्रभु (सोमपाः) = हमारे अन्दर सोम का रक्षण करते हैं। इस सोमरक्षण के द्वारा (उत्तरः भवन्) = हमारे जीवनों में प्रभु ऊपर और ऊपर होते हैं, अर्थात् हम प्रभु की ओर अधिकाधिक झुकाववाले बनते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु की उपासना से आसुरी भाव विनष्ट होते हैं। इनके विनाश से शरीर में सोम का रक्षण होता है और हमारा प्रभु की उपासना के प्रति झुकाव बढ़ता है। अगले सूक्त के 'ऋषि देवता' भी इसी प्रकार हैं। सो वही विषय प्रस्तुत है-