क॒दा त॑ इन्द्र गिर्वणः स्तो॒ता भ॑वाति॒ शंत॑मः । क॒दा नो॒ गव्ये॒ अश्व्ये॒ वसौ॑ दधः ॥
kadā ta indra girvaṇaḥ stotā bhavāti śaṁtamaḥ | kadā no gavye aśvye vasau dadhaḥ ||
क॒दा । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । गि॒र्व॒णः॒ । स्तो॒ता । भ॒वा॒ति॒ । शम्ऽत॑मः । क॒दा । नः॒ । गव्ये॑ । अश्व्ये॑ । वसौ॑ । द॒धः॒ ॥ ८.१३.२२
शिव शंकर शर्मा
इस मन्त्र से प्रार्थना करते हैं।
आर्यमुनि
अब सुखी होने के लिये परमात्मा से और याचना करते हैं।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
[१] प्रभु प्राप्ति के लिये आतुरता को अनुभव करता हुआ स्तोता कहता है कि हे (गिर्वणः) = ज्ञान की वाणियों से सम्भजनीय (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (कदा) = कब (ते स्तोता) = आपका यह स्तवन करनेवाला उपासक (शन्तमः भवाति) = शान्त जीवनवाला होता है? अर्थात् आपका स्तवन करता हुआ कब मैं शान्ति को प्राप्त करूँगा? [२] (कदा) = कब आप (नः) = हमें (गव्ये) = ज्ञानेन्द्रिय सम्बन्धी तथा (अश्व्ये) = कर्मेन्द्रिय सम्बन्धी (वसौ दधः) = वसु में धारण करोगे? अर्थात् कब आपकी कृपा से हमें उत्तम कर्मेन्द्रियाँ व उत्तम ज्ञानेन्द्रियाँ प्राप्त होंगी?
शिव शंकर शर्मा
अनेन मन्त्रेण प्रार्थ्यते।
आर्यमुनि
अथ सुखित्वं तत्सकाशाद् याच्यते।
