'सुवीर्य स्वश्व्य-सुगव्य'
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो! आप (नः) = हमारे लिये (सुवीर्यम्) = उत्तम वीर्य को, (स्वश्व्यम्) = उत्तम कर्मेन्द्रिय समूह को तथा (सुगव्यम्) = उत्तम ज्ञानेन्द्रिय समूह को (दद्धि) = दीजिये । गत मन्त्र के अनुसार सदा प्रभु-स्तवनपूर्वक उत्तम कर्मों को करने से हमें 'सुवीर्य स्वश्व्य व सुगव्य' की प्राप्ति होती है। [२] हे प्रभो ! आप (होता इव) = एक होता के समान (प्राध्वरे) = प्रकृष्ट हिंसारहित कर्मों में हमारी गति के होने पर (पूर्व चित्तये) = हमारे लिये पालक व पूरक चित्ति के लिये हों। हमें आप उस ज्ञान को दें, जो हमारा पालन व पूरण करनेवाला हो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु के अनुग्रह से यज्ञादि उत्तम कर्मों में चलते हुए सदा पालक व पूरक ज्ञान को प्राप्त करें। प्रभु हमारे लिये 'सुवीर्य, स्वश्व्य व सुगव्य' को दें। अपने जीवन को अध्वरों में पवित्र करनेवाला यह व्यक्ति अपने पवित्र जीवन से औरों को भी पवित्र करता है सो 'नारद' (नारं नरसमूहं दायति) कहलाता है। यह 'काण्व' अत्यन्त मेधावी नारद इन्द्र का स्तवन करता हुआ कहता है कि-